Tuesday, May 24, 2022
60-65 वर्ष का साथ , Doctor के कहते ही , She is not anymore , एक ही पल में समाप्त हो गया ....
खबर मिलते ही घर मेहमानों और रिश्ते नाते के तमाम लोगों से भर गया ,
दादा जी एकदम चुप से हो गये थे, चुप और गुमसुम ,
रस्म रिवाजों का लम्बा सिलसिला चला और अतंत: दादी की एक हसंती मुस्कुराती तस्वीर चन्दन के हार के साथ दीवार की शोभा बन गई ,
दादा जी का समस्त अस्तित्व एक सफेद कुर्ते पजामे में समा गया ....
धीरे धीरे सब समान्य होता जा रहा था ....
बस दादा जी की उदासी और दीवार पर लटकी दादी की हंस्ती हुई तस्वीर की उदासी नहीं जा रहीं थी ,
दिन , सप्ताह , महीने गुज़र गये ....
मौसम बदला और एक दिन घनघोर काले बादलों के साथ मुसलाधार बारिश होने लगी , दादा जी यूँ ही अनमने मन से कभी बादलों को देखते और कभी बारिश में भीगते अपने पेड़ पौधों को जिनको कभी बड़े ही चाव से लगाया था ....
इतने में ही ना जाने कहाँ से एक कुत्ते का छोटा सा बच्चा बारिश से बचने के लिए दादा जी के घर में घूस आया और कूँ कूँ करता दादा जी के पैरों के पास आ कर बैठ गया ...
कभी दादा जी के पैरों को चाटता कभी उनकी तरफ देखता ....
लाख दादा जी के उसको बाहर करने के प्रयास विफल हो गये ,
वोह जैसे उस घर को अपना मान चुका था ,
कई दिन तक वोह घर के अंदर प्रवेश ना पा सका हाँ पर वक़्त से भोजन जरूर पा जाता था ....
अंत में थक हार कर विजय कुत्ते के बच्चे की ही हुई और दादा जी ने हथियार डाल कर उसको अपना लिया ...
भोर की पहली किरन के साथ दादा जी के घर का दरवाजा खुला , और दादा जी अपने नये साथी के साथ महिनों बाद एक बार फिर Morning Walk पर जाने के लिए अपने gate से बाहर निकाल आयें ....
दादी आज वाकई तस्वीर से निकल कर मुस्कुराती हुई सी लगीं ....
Sunday, May 15, 2022
काशी.....
जब कुछ लिखने बैठा था तब सोचा था कि चंद यादे ही तो शब्दों के माध्यम से पिरोनी है ,पिरो लूँगा....
पर यह कार्य इतना दुष्कर और जटिल हो जायेगा इसका मुझे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं था।
काशी ....शिव की नगरी ,जो अब श्री नरेंद्र मोदी की नगरी हो गई है ,बदली हुई राजनैतिक परिस्थितयों में ,यहाँ के लोगो को शायद शिव से इतनी उम्मीदे नहीं होंगी जितनी अब श्री मोदी से है ,खैर विषय को राजनैतिक न बनाते हुए फेसबुकिया ही रखते हैं ,हल्का फुल्का ,बनारसी चुहलबाजी से भरपूर।
फरवरी 2007 मैं मैंने पहली बार इस 3000 वर्ष से भी प्राचीन नगरी में अपने चित्रो की प्रदर्शनी करने का सौभाग्य पाया था ,यात्रा और अनुभव अच्छा रहा था पर मन में एक कसक रह गई थी कि गंगा आरती नहीं देख पाया , सो इस बार ठान कर निकला था कि चाहे कुछ भी हो जाये गंगा आरती का तो सुख ले कर ही रहूँगा...
आभारी हूँ वहां के मेरे मित्रो का जिन्होंने इस अद्भुत दृश्य और अनुभूति से मेरा परिचय कराया ,हज़ारों की भीड़ पर जर्रा भर भी कलरव नहीं .....
वातावरण में था तो बस मंत्रो की गूँज और लोबान का महकता हुआ धुआँ .....
जो हम सब को एक ओंकार से जोड़ रहा था …
कुछ अनुभूतियाँ शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती ,उस के लिए आप को एक बार बनारस के उन घाटो पर जाना ही पड़ेगा ,और यकीन मानिए सौदा घाटे का नहीं रहेगा।
यूँ तो इतनी यादे ले कर लौटा हूँ कि बनारस के १०० घाटो से भी ज्यादा पन्नें भर सकता हूँ ,पर कुछ चुटीले और कुछ दार्शनिक अनुभव ही साँझा करूँगा , घाट किनारे जब माथा भर भर के तिलक लगते पंडितो को देख कर मैं अपने दिल पर काबू नहीं कर पाया तो मैं भी एक बनारसी गोल छतरी के नीचे बैठे पंडित के पास बैठ गया और आग्रह किया कि माथा भर कर सुन्दर सा तिलक सजा दे ,एक मित्र के टिप्पडी करने पर कि ऐसा टीका लगाना पंडित जी कि इस के पाप धूल जाये ,ख़ास बनारसी अंदाज़ में चुहलबाज़ी करते हुए पंडित जी अत्यंत कुटिलता से बोले की ..... अरे बबुआ पाप न करीं तो बाप कइसन बनी।
कहना व्यर्थ होगा की वह एक जोर का ठाहका गूँज उठा ....
इसी प्रकार मेरे एक मित्र के आग्रह पर जब हम सब उत्तपम खाने एक बेहद सरल से दिखने वाले व्यक्ति के पास गए जिस के हाथो में स्वयं माँ अन्नपूर्णा का वास था ,इतना स्वादिष्ट उत्त्पटम् आप किसी महंगे से महंगे दामी भोजनालय में भी नहीं पाएंगे ऐसी मेरी गारंटी हैं ,खैर उत्तपम पर्व खत्म हुआ, चलते चलते सोचा की तारीफ कर दे और धन्यवाद दे दे , इस पर उस सज्जन व्यक्ति ने इतनी दार्शनिक बात कह डाली की सुन कर उस के आत्मिक ज्ञान एहसास हो गया
...
बाबू जी यह मेरे लिए उत्तपम नहीं है ,यह मेरे लिए मेरे परिवार का भविष्य है और मैं अपने परिवार के भविष्य के संग खिलवाड़ और बेईमानी कैसे करुँ , पूरी ईमानदारी से काम करता हूँ बाकि भगवान् की मर्ज़ी
....
अंत करना चाहूंगा इस यात्रा का पर संभव नहीं हो पायेगा क्यूंकी मेरे कलाकार अस्तित्व का एक भाग अभी भी गंगा मैया के पावन जल में डुबकी लगा लगा कर वही किसी घाट के कोने में शिव की भांग में मद मस्त हो कर झूम रहा है....
( Painting is done by knife on paper with some collage work).
Sunday, May 8, 2022
वोह खत जो कभी लिखा ही नहीं ....
किसको लिखता वोह सब जो मैँ चाहता तो था पर कभी हुआ ही नहीं ,
कौन था जो वोह सब समझता जो मैं लिखता ,
बिना मुझे समझाये बस मुझे समझता ,
वोह सब पढ़ता जो मैं केवल उसके लिए लिखता ,
सुनो ,
अगर मैं बोलता तो वोह बस सुनता ....
अगर मैँ दिल खोलता तो वोह दिमाग नहीं खोलता ....
अगर खत में मुस्कान होती तो वोह भी खिलखिलाता ,
और अगर आंसू होते तो वोह अपना कांधा देता ....
पर यह सब बस ख्याल ही रहें ,
इसी लिए , यहीं वोह खत हैं जो मैनें कभी किसीको लिखा ही नहीं .....❤️❤️
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