Wednesday, October 14, 2020

 बात  होगी तकरीबन  1985-86 की ,

बहन  की शादी  हो गई  थी ,

भाई  IIT में  था ,

मैं  घर  पर  अकेला रह गया था ,

टी  वी  तो था  पर  कोई कब  तक  चौपाल  देख सकता था ,

तभी  दोस्तों  से सुना  कि  VCR  नाम  की कोई चीज  आयी  हैं ...

बस घर  बैठे  बैठे  आराम  से पिक्चर  देखो और मौज  करो ,

Daddy Mummy को  पटाया ,

किस्मत  का  धनी  हूँ  तो पता  चला  कि  हमारे  एक दूर  दराज के  नातेदार  दुबाई  में  निवास  करते  हैं  और  शीघ्र  ही  लखनऊ आने  वाले  हैं ,

उन  से सम्पर्क  साधा  गया और VCR लाने  का  अनुरोध  किया  गया , जल्दी  ही हमारे  यहाँ  VCR आ  गया ...

बहुत  खोजने  के  बाद  लाल बाग  में  Novelty Cinema के  पास  एक Video Cassette की Library भी खोज निकाली  गई ,

खैर  एक नियत  वक़्त  पर  मित्र  मंडली के  साथ  VCR का  श्री गडेश  किया  गया ....

पिक्चर  खत्म हो गई ,

खट  पट  की अवाज  के  साथ  cassette बाहर  निकाला  गया ,

और  एक  Audio cassette की तरह  उसको भी पलट  कर  डालने का  भागिराथी  प्रयास  शुरू  हुआ ....

सोच यहीं  थी  कि  जैसे  audio cassette दोनों  तरफ  से बजता  हैं  वैसे  ही  यह भी चलता  होगा .....

सारे  permutations & combinations अजमा  लिए  गये , पर  अली बाबा  40 चोर  की वोह  गुफा  नहीं  खुलनी  थी  सो  नहीं  खुली ....

बस  जब  थक  हार  कर  हम  सब  बैठ  गये  तो हम  में  से  ही एक  मित्र  ने  एक मोटी  सी  गाली  से हम  सबको  सम्बोधित  करते  हुए  जानकारी  दी  कि  यह  Audio cassette नहीं  हैं ....

जो  दोनों  तरफ से बजेगा ,

बेवकूफो पिक्चर  खत्म  हो गई  और  तुम सब  बेकार  में  मेहनत  कर  रहे  हो ....

हम  सब  खिस्यानी  बिल्ली  से  खम्बा खोजने  लगे , नोचने  के  लिए .....

Thursday, September 10, 2020

 जिस भय  के साथ  कई  साल जिया वोह अचानक  10 फरवरी 2020 को प्रात: 5.20 पर  खत्म  हो गया ,

भय  अपने  माता  पिता  की सांसों  को लें  कर ....

रोज सुबह  उठ  कर  देखता कि  पिता  जी के कमरे  का  दरवाजा खुला  हैं ,

light जली  हुई हैं  मतलब  daddy  उठ  गये  हैं ....

कभी ऐसा  नहीं देखता  तो पास  जा  कर देखता , उनकी  सांसों  को सुन  कर आश्वस्त हो जाता  कि daddy ठीक  हैं  और  सुबह  की  चाए  बनाने  का  वक़्त  और  Daddy को अवाज  दे  कर उठाने  का  वक़्त  हो गया  हैं .....

कितने  साल यहीं क्रम  दोहराता  रहा .....

और  खुद को उस  घड़ी  के  लिए  तैयार  करता  रहा जब जीवन  की सब से बड़ी परीक्षा  की घड़ी  से गुजरना था ....

चाह  कर  भी कभी यह हिम्मत  जुटा  नहीं पाया ,

फिर  ना  जाने  कैसे कहाँ  से इतनी  हिम्मत  आ  गई  कि Doctors  के  कहने  पर  कि We are Sorry....

एक आंसू  भी आँख  से नहीं निकला ....

दिमाग  सुन्न  हो चुका  था ....

बस किसी  मशीन की  तरह  सारा  काम  करता  गया ....

और Daddy को यूँ  ही सारे  विधि  विधान  निभाते  हुए  विदा  कर  दिया ....

भले  ही वोह देहिक  रुप  में  मेरे साथ  नहीं  हैं परंतु  आज  वोह पूर्ण रुप से मेरे  अंदर  समा  चुके  हैं ....

ताज्जुब  होता हैं  कि  कैसे मेरे हाथ , पैर,  मेरा बोलना , चलना और  भी  ना  जाने  क्या  क्या  बिल्कुल  उनके जैसा  होता जा  रहा है ....

इसी  के साथ  ही साथ  वोह  मुझे समझा  गये जीवन का शाश्वत  सत्य ...

म्रत्यु  अटल हैं ....

Friday, September 4, 2020

 जीवन में  जिस  ने आपको  माँ  बोलना  सिखाया  या  फिर ABCD  से परिचित  कराया वहीं  आपका  गुरु  हो ऐसा  ज़रूरी  नहीं ,

जीवन  में  आये  उन  गुरु  को भी नमन  करें  ज़िन्होने  आपको  cigrette  का  पहला  कश  लेना  सिखाया ,

दारू  के संग  चखना कितना  अहम  होता  हैँ  वोह कांधे  पर  बड़े  प्यार  से हाथ  रख  कर  मुफत  में  यूँ  ही समझाया ....

बालिग  होते  वक़्त  की  दुरूह  ग्रंथियो  को  धीरे  धीरे  बड़े  ही प्यार  से सुलझाया ....

नमन  करता  हूँ  आज  ऐसे  सभी जीवन  में  गुरु  लोगों  को  ज़िन्होने  सीटी  बजाने  की  अद्भूत  कला  से अवगत कराया ,

सीटी  कितने  प्रकार  की  होती  हैँ  यह भी बताया ....

लड़की को  देख  कर  बजाने  वाली  सीटी ,

जानवारों  को  देख  कर  बजाने  वाली ,

तोते  वाली  सीटी  और  भी नाना  प्रकार  की सीटी ....

तेज  गती  से  चल  रही  Scooter  पर  कैसे  आगे  से  पीछे  य़ा  पीछे  से आगे आया  जाये  यह भी  बताने  से नहीं  चूके ...

किताबी अध्यन  तो आप  अपनी  बढ़ती  उम्र  और  अपने  अध्यन  के छेत्र  के  हिसाब  से भूल  या  फिर याद  रख  सकते  हैँ ..

परंतु  उपरोक्त  शिक्षा आप  चाह  कर  भी नहीं भूल  पायेंगे ....

यह  ठीक  वैसे  ही हैँ  जैसे  जीवन  में  cycle  चलाना  सीखना ,

सीख  लिया  तो कभी  भूले  ही  नहीं ....

चाहे  कैंची   चलाई चाहे गद्दी   पर ...

इसी  लिए कहा  गया  हैँ  कि  मित्र  से अच्छा  कोई गुरु नहीं ....

हर  कमीने मित्र  को  Teacher's day की  बधाई...

Friday, August 14, 2020

 स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर १ विचार मन में आया है..

कितने वर्ष बीत गए स्वाधीन हुए...हम में से कितने होंगे जिनको यह पता भी नहीं होगा की देश को स्वाधीन हुए कितना लम्बा अरसा हो गया..कुछ लोगो के लिए 

स्वाधीनता का अर्थ केवल facebook पर तिरंगे की फोटो लगाना..और स्कूल से आये बच्चो द्वारा लाये गए लड्डू का सेवन करना ही है..

बापू ने हम सब को अहिंसा का सन्देश दिया...परन्तु आज हम उसी  सन्देश की पूरी तरह से अवहेलना करते नज़र आ रहे है..

आज भी इस देश में फांसी जैसी सजा का प्रावधान है..

क्या यह अपराध नहीं है..अभियुक्त ने अपराध किया..उस ने मासूमो की जान ली..पर हमने और हमारी कानून  व्यवस्था ने तो उस से भी जघन्य अपराध कर डाला..उस अभियुक्त को फासी दे कर...

क्या उस अभियुक्त की मानसिकता को बदलने  का प्रयास करना १ सुंदर प्रयास नहीं होता इस सुसंसकृत सभ्य समाज का...कहा जाता है की आदमी के पापो से घृणा करो पापी से नहीं...परन्तु यहाँ तो हमने पाप को पापी के संग ही ख़तम कर डाला..

मुझे लगता है की जेल में सजा काट रहे सजायाफ्ता लोगो को योग और अन्य सामाजिक संस्थाओ के माध्यम से सुधरने और १ सभ्य नागरिक बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए..

जब सजायाफ्ता अपराधी सजा काट कर बाहर आये तो अपनी परिवेर्तित मानसिकता से समाज के लिए १ सुंदर उद्धरण प्रस्तुत करे...ऐसा सोचना ही अपने आप में कितना सुखद अनुभव है...

Sunday, August 9, 2020

 अतीत  में  जाना  कोई मुशकिल  काम  नहीं  हैं ,

बस  यादों  का  दरवाजा खोलिये ,

चरमाराता  हुआ  दरवाजा , आवाजें  निकालता  हुआ  आपको  वहां  लें  जायेगा  जहाँ  एक सीले  हुए  से कमरे  में  वोह  सब  यादें  और  आपके  अपने  मिल  जायेंगे  जो  वक़्त की  धूल  में  कहीं  दब  गये  हैं...

मैं अगर  याद  करूँ  तो  मुझे  याद  आता  हैं  मेरी  नानी के घर  का  वोह  पुराना  काला  पड़  चुका  लकड़ी  का  दरवाजा जो  काफी  जोर  लगाने  के बाद  खुलता  था  और  लोहे  की  कुंडी , अपना  अलग  ही  सरगम सुनाती  थी ....

सीला  सा  कमरा ,

नानी  की खाट ,

नाना  का  तख्त ,

ढेरों  आयुर्वेदिक  दवाओं  की अजीब  सी  खुशबू ...

पुराना  लटकता  हुआ  पीला  पड़  चुका  पंखा ....

कमरा  पार  कर के  आगन  में  पहुंचते  ही  नानी  की रसोई  दिखाई  देती थी ,

रसोई  में  उनका  स्टोव  और  उनके  पीले  रंग  वाला  Plastic का  मसालदान आज  भी याद  हैं ....

सब  कुछ नाना  का  होते  हुए  भी घर  नानी  का  क्यूँ  कहाँ  जाता  था , यह आज  तक  समझ  नहीं  आया ....

खैर  नानी  ने कभी कुछ ऐसा  बनाया  या  खिलाया  हो  जो याद  रह  जाये  , यह तो याद नहीं , हाँ  उनका  बनाया  हर  खाना  होता  बहुत स्वाद था ....

लाड़  और  दुलार  का  छोंक , देशी  के साथ ...

शायद  यहीं राज़  था  उनकी  रसोई  का ...

नाना  का  वोह  सुबह  सुबह  मुरादाबादी  दाल , बांस  की  टोकरी  में  लाना , गर्म  गर्म  जलेबी  के साथ ....

जो दाल हम  बचपन  से खाते  चले  आ  रहें  हैं  आज  वोह International Level पर  अपनी  जगह  बना  चुकी  हैं ,ऐसा  होगा  यह कभी भी नहीं सोचा  था ....

हाँ , बातों  बातों  में  भूल  ना जाऊँ , बताता  चलूं , नानी  की  सूती  साड़ी  में  से आने  वाली  वोह खुशबू आज भी याद  हैं .....

हाथ  की झूर्रियों  को जब  मैं  समेट  कर पूछता  कि यह कैसे  पड़  गई , तो  हसंते  हुए  बोलती  कि  अब  तो यह चिता  में जा  कर ही मिटेगी ....

वैसी  ही झूरियां  अब माँ  के  हाथ में  देखता  हूँ  पर  कुछ  कहने  या  पूछने  की हिम्मत  नहीं कर पाता .....

धीरे  धीरे  जिन  रिश्तों  के साथ  हम  पैदा  हुए  थे ,

सब  खत्म  होते  जा  रहे  हैं ,

नये  रिश्तो में  अभी वो  गर्माहाट नहीं  हैं , स्थिती  कुछ कुछ त्रिशांकु सी  हैं ....

उम्मीद  हैं  एक  दिन नये  रिश्ते  महकेंगे और  हमको  यादों  की  इन  विचित्र  गलियों  से नहीं  गुजारना पड़ेगा ....

Sunday, July 26, 2020

आज एक  अनोखा  एहसास  हुआ ....
कभी  ध्यान  किया  हैं  आपने  अपने  घर  के  बुजर्गो  को  देख  कर ,
वोह  भविष्य  की  चिंता  ना  कर  के  अपने  भूतकाल  के  किस्से  या  अपनी  स्मरतियो में बसे  कुछ  नाम  और  दास्तां  सुनाते  हैं ....
और  अपने  पोपले मुंह  में  ना  जाने कितने  शब्द  छुपा  कर  रखते  हैं  और  धीरे  धीरे  एक  एक शब्द  निकाल  कर  उसकी  माला  सी  बुनते  चले  जाते  हैं ...
वही  हम  इस  पीढी  के  ना  घर  के  ना  घाट  के  समान,
  ना  वर्तमान में जी  पाते  हैं  और  भविष्य की सोच  सोच  कर  वैसे  ही  वक़्त  के  पहले  ही  मुंह  झूरियों  से  भर  लेते  हैं ....
इस  लिये  ही  कहते  हैं  बुजूर्ग  आज  भी हमारे  आँगन के  वोह  बरगद के  पेड़ हैं  जिनकी  छाव  में  पल  भर  बैठ कर  हम  अपने  जानकारी  और  ध्यान  में  इजाफा  कर  सकते  हैं ...
आशा  हैं  कि  आप  इशारा  समझ  गए  होंगे ....
सवाल  यह  नहीं  कि  हमने  अपने  माता  पिता  का  कितना  ध्यान  रखा ,
कैसे  एक  बच्चे  की  तरह  उनको  देखा  और  पाला  पोसा ....
सवाल  यह  हैं  कि  हम  को  कौन  देखेगा ,
क्या  हमारे  बच्चे  कर  पायेंगे  यह ....
भयावाह हैं  सोचना  भी ....
बच्चों  को  संस्कार  दिजिये  महंगे cell phones  नहीं ....
चलिये  आज  कुछ  लिख  ही  डालता  हूँ ,
आज  जब  यूँ  ही  अपने  परम  सखा  बाल  हनुमान के  चित्र  को  साँझा  किया  आप  सब  के  साथ  तो  ढ़ेरो  प्यार  और  शुभकामनायें  आप  सब  से मिली ...
मन  प्रसन्न  हुआ ....
तभी  किसी  मित्र  ने सवाल  किया  कि  यह  कौन  सा  प्रकरन हैं ऐसा  तो कभी  देखा  य़ा  सुना  नहीं ....
तो  जवाब  यह  हैं  कि  शायद  भगवान  के  बाद  हम  कलाकार  ही  हैं जो  भावनाओँ  और  चिंतन को  एक मूर्त  रुप  प्रदान  कर  देते  हैं ....
जो  कुछ आपने  नहीं  सोचा  होता  जब  वही  आपके  सामने  होता  हैं  तो आप  भी  आल्हादित  हो  जाते  हैं ,
फिर  उनका  सवाल  था  कि  यह  आप  केवल  हिन्दू  देवी  य़ा  देवता  के  संग  ही  कर  सकते  हैं  क्यूंकी  आप  जानते  हैं  कि  हम  हिन्दू  कुछ  बोलेंगे  नहीं ,
तो इस  पर यह  कहना  चाहूँगा  कि  आप  अपनी  मन  की  अपने  मित्र  के  साथ  ही  करते  हैं  क्यूंकी  वोह आपको  समझता  हैं ....
अजनबी के  संग  कौन  दिल्लगी  करता  हैं ....
फिर भी  अगर  कभी  ऐसा  कोई विचार  दिल  में  आया  और  मर्यादित हुआ  तो उसको  चित्रित  करने  से  चूकुंगा  नहीं ....
बाकी  समय  जवाब  देगा ....
एक  बार फिर  से  आप  सब  को  ढेर  सारा  प्यार  और  आशीर्वाद .....
आज सुबह  से  एक  बेहद  मजाकिया ख्याल  दिमाग  में  हैं ...
देखता  हूँ  ख्याल  को  कहाँ  तक  शब्दों  का  ज़ामा  पहना  पाता  हूँ ....
डाक विभाग से  एक  post  card  मिला  करता  था ...
पिला सा ,मटमैला सा और  आयाताकार आकार का ....
आज  कल  के  बच्चों  ने  शायद  देखा  भी  नहीं  होगा ...यह  पढ़ने  के  बाद  शायद  कुछ  लोग  google  में  खोजे ...
संदेश  पहुचाने  का  सब  से  सुन्दर  सस्ता  और  टिकाऊ  तारिका  हुआ  करता  था ...
पर  मजाक  कि  बात  यह  थी  कि  जो  बाते  हम सब  से  छुपाते  हैं  वही घर  भर  की  पुराण  हम  बड़े  शान  से  इस  कागज  के  पुरचे  पर  लिख  कर  भेज  देते  थे ....
ना  किसी के  पढ़ने  का  डर ना  ही  कोई  शर्म ...
चाहे  साजन  सजनी का  प्यार  हो ...
चाहे  सासुराल  में  पड़ी  सास  नन्द की  फटकार ...
फिर  चाहे  बाबुल  का  प्यार  हो ...
य़ा  सावन  पर  घर  आने  की  माँ  की  मनुहार ....
सब  कुछ  साफ  और  खुला  खुला ....
उन  खतों  में  वास्तव में  रिश्तो की  खुशबू  हुआ  करती  थी ....
अपनो  का  स्पर्श  का  एहसास  हुआ  करता  था ....
हो  सकता  हैं  कि  कई  मित्रों  के पास  आज  भी  कुछ  यादें  किसी  पोटली  में  समय  के  साथ  पीले   पड़  गये  कपड़े के  साथ  बंधी  रखी  हो ....
अगर  हो  तो खोल  कर  देखियेगा ....
यादों  से  आप  और  आप  का  मन  महक उठेगा ....
चिठ्ठी  आयी  हैं ,
आयी  हैं  चिठ्ठी  आयी  हैं .....
काशी.....
जब कुछ लिखने बैठा था तब सोचा था की चंद यादे ही तो शब्दों  के माध्यम से पिरोनी है ,पिरो लूँगा....
पर  यह कार्य इतना दुष्कर और जटिल हो जायेगा इसका मुझे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं था। 
काशी ....शिव की नगरी ,जो अब श्री नरेंद्र मोदी की नगरी हो गई है ,बदली हुई राजनैतिक परिस्थितयों में ,यहाँ के लोगो को शायद शिव से इतनी उम्मीदे नहीं होंगी जितनी  अब श्री मोदी से है ,खैर विषय को राजनैतिक न बनाते हुए फेसबुकिया ही रखते हैं ,हल्का फुल्का ,बनारसी चुहलबाजी से भरपूर। 
फरवरी 2007 मैं मैंने पहली बार इस 3000 वर्ष से भी प्राचीन नगरी मैं अपने चित्रो की प्रदर्शनी करने का सौभाग्य पाया था ,यात्रा और अनुभव अच्छा रहा था पर मन मैं एक कसक रह गई थी की गंगा आरती नहीं देख पाया , सो इस बार ठान कर  निकला था की चाहे कुछ भी हो जाये गंगा आरती का तो सुख ले कर  ही रहूँगा...
आभारी हूँ वह के मेरे मित्रो का जिन्होंने इस अद्भुत दृश्य और अनुभूति से मेरा परिचय कराया ,हज़ारों की भीड़ पर  जर्रा भर भी कलरव नहीं .....
वातावरण मैं था तो बस मंत्रो की गूँज और लोबान का महकता हुआ धुआँ .....
जो हम सब को एक ओंकार से जोड़ रहा था … 
कुछ अनुभूतियाँ शब्दों मैं व्यक्त नहीं की जा सकती ,उस के लिए आप को एक बार बनारस के उन घाटो पर जाना ही पड़ेगा ,और यकीन मानिए सौदा घाटे  का नहीं रहेगा। 
यूँ तो इतनी यादे ले कर लौटा हूँ  की बनारस के १०० घाटो से भी ज्यादा पन्नें भर सकता हूँ ,पर  कुछ चुटीले और कुछ दार्शनिक अनुभव ही साँझा करूँगा , घाट किनारे जब माथा भर भर के तिलक लगाते  पंडितो को देख कर  मैं अपने दिल को नहीं रोक   पाया तो मैं भी एक बनारसी गोल छतरी के नीचे बैठे पंडित के पास बैठ गया और आग्रह किया की माथा भर कर सुन्दर सा तिलक सजा दे ,एक  मित्र के टिप्पडी करने पर  की  ऐसा टिका लगाना पंडित जी की इस के पाप धूल जाये ,ख़ास बनारसी अंदाज़ में  चुहलबाज़ी करते हुए पंडित जी अत्यंत कुटिलता से बोले की ..... अरे बबुआ पाप न करीं तो बाप कइसन बनी। 
कहना व्यर्थ होगा की वह एक जोर का ठाहका गूँज उठा ....
इसी प्रकार मेरे एक मित्र के आग्रह पर  जब हम सब उत्तपम खाने एक बेहद सरल से दिखने वाले व्यक्ति के पास गए जिस के हाथो मैं स्वयं माँ अन्नपूर्णा का वास था ,इतना स्वादिष्ट उत्त्पम् आप किसी महंगे से महंगे दामी भोजनालय मैं भी नहीं पाएंगे ऐसी मेरी गारंटी हैं ,खैर उत्तपम पर्व खत्म हुआ, चलते चलते सोचा की तारीफ कर दे और धन्यवाद दे दे , इस पर उस सज्जन व्यक्ति ने इतनी दार्शनिक बात कह डाली की सुन कर  उस के आत्मिक ज्ञान  एहसास हो गया
 ... 
बाबू जी यह मेरे लिए उत्तपम नहीं है ,यह मेरे लिए मेरे परिवार का भविष्य है और मैं अपने परिवार के भविष्य के संग खिलवाड़ और बेईमानी कैसे करुँ , पूरी ईमानदारी से काम करता हूँ बाकि भगवान् की मर्ज़ी
 .... 
अंत करना चाहूंगा इस यात्रा का पर संभव नहीं हो पायेगा क्यूंकी मेरे  कलाकार अस्तित्व का एक भाग अभी भी गंगा मैया के पावन जल में डुबकी लगा लगा कर वही किसी घाट के कोने में शिव की भांग में  मद मस्त हो कर  झूम रहा है.....
बात  उन  दिनों  की  हैं  जब  लोगों  के  मिजाज़  और मौसम  के तेवर इतने  गर्म  नहीं  हुआ  करते  थे ,
स्कूल  बंद  होते  ही , नानी  के घर  जाना  अनिवार्य  हुआ  करता  था  और  शायद  यहीं  एक  काम  ऐसा  होता  था  ज़िसका  थोपा  जाना  हमको  बुरा  नहीं  लगता  था ,
ट्रैन  का  वोह  धूल  भरा  सफर ,
अजनबी पसीने  की  गंध ,
मिट्टी  की  सुराही  का  शीतल  जल  और  पूरी  आलू  की  सुगंध , वहीं  हमारा  पूरा  संसार  हुआ  करती  थीं ,
अरे  हाँ ,
Station पहुचं  कर  वोह  वजन लेने  वाली  machine  पर  ठीठकना और  Mummy  की  तरफ  देख  कर  वोह  10 पैसे  के  सिक्के  के  लिए  अर्जी  लगाना  आज  भी  याद  हैं ,
रास्ते  में  पढ़ने  के लिए  चन्दामामा  से ले  कर  चाचा  चौधरी  तक  ना  जाने  कितनी  ही  किताबें  ले  लेना ,
बहन  भाई  से लड़  कर  खिडकी  के पास  वाली  Seat  लेना , और  द्रूत  गती  से भागते  हुए  पेडों  को  देखना , अपना ही  एक  अलग  आनन्द  हुआ  करता  था ....
Train  के  plateform  पर  पहूचने  पर  नाना  को  कभी  खोजना  नहीं  पड़ा , सफेद  चिट्टे  कुरते  पजामे  में  वोह  हमेशा  इंतेजार  करते  हुए  मिला  करते  थे ,
Station  से नानी  के घर  तक  का  सफर  रिक्शे  में  नाना  के  संग  बात  करते कैसे  कट  जाता  था , कभी  पता  ही नहीं  चला .....
घर  नाना  का  होते  हुए भी हमेशा  नानी  का  घर  कैसे  कहलाया जाता  हैं यह  समझ  नहीं  आया ....
फिर शुरू  होता  था  नानी  का  लाड़  प्यार ....
ज़िसकी  कोई  सीमा  नहीं  होती  थी ,
माँ  भी  वहां  जाकर  एकदम  शांत  हो  जाती  थी ,
देशी  घी  में  ना  जाने  नानी  कौन  से प्यार  का  मसाला  डाल  कर  छोंक  लगाती  थी  कि  कब  खाना  खत्म  हुआ , पता  ही  नहीं  चलता  था ....
रात  होते  ही  घर  की  छत पर  बान से बुनी  हुई  चारपाई डाली  जाती  थीं  और उन  पर  बिछती  थी  सूती  सफेद  च्ददर ,
रात  होते  होते  चाँद  की  रोशनी  उन  चादारों  को भी  एकदम  शीतल  और  आरामदेह  कर  देती थी ,
फिर  लेट  कर  तारों  को  गिनने  का  सिलसिला  शुरू  होता  था  जो  सुबह  होने  तक  चलता  था ....
बस  इनही  खेलों  में  15-20 दिन  कैसे  निकल  जाते  थे  पता  ही नहीं  चलता  था ,
कठिन  होता  था , नानी  को  रोता  हुआ  छोड़  कर  आना , वोह उनकी  ठोडी  पर  रोते  समय  10 पैसे  का  सिक्का  सा  छप जाना और  उनकी  भरी  हुई  आँखो  को  देखना , उफ़  नहीं  याद  करना  चाहता  मैँ ....
उनके  आँचल  की  बिना  किसी  इत्र  से महकती हुई  खुशबू आज  भी  याद  हैं ....
आज  53 साल  की  अवस्था  में  ना  नाना  रहें  ना  नानी ,
नानिहाल  भी  खण्डार  हो  चला  एक  पुराना  मकान हो गया  हैं  ज़िसका  अस्तित्व भी  बस  अब कुछ  दिन  का  ही शेष  हैं ....
पर  आज  भी  याद हैं  नानिहाल  में  गुजरे  हुए  वोह  दिन ......
आज कुछ ऐसा लिखने  वाला  हूँ  जो मेरा विषय  कतई नहीं  रहा ,
परंतु  चूकीं  मैँ  भी इस  वर्षों  पुरानी  कला  का  एक छोटा  सा हिस्सा  हूँ  इसलिये  अगर  नहीं  लिखूँगा  तो वोह भी  नाइंसाफी  होगी  और चुप  रहना  वैसे भी  मेरी  आदत में  नहीं  हैँ ....
यहाँ  हम  बात  कर  रहे वर्षों  पुरानी  कला  बोंसाई  की ,
जहाँ  पर  कुछ खास  किस्म  के पौधो  को  काट छाट कर एक मनचाहा आकार  दे  दिया  जाता  हैँ  और  एक पेड़  के रुप  में  आने  वाले  कई  सालों  तक  यूँ  ही  पनापने  दिया  जाता  हैँ  पर  इस  पूरी  प्रक्रीया में  पेड़  का  पूरा  ध्यान  रखा  जाता  हैँ ,
उसकी  ज़रूरी  कांट  छाट  से लेकर उसके  खान  पान  तक  का ....
cutting करने  के बाद  उसके  घाव  पर  मारहम भी  लगाया  जाता  हैँ ,
मौसम  के अनुसार पेड़  की  cutting  की जाती  हैँ ,
  cutting  भी उतनी  ही जितनी  हम  स्वयं अपने  बालों  य़ा नाखूनों  की  करते  हैँ  स्वयं  को  सुन्दर  बनाने  के लिए ,
इस  खास  कला  के लिए कुछ  खास  किस्म  के पौधो  का  ही चुनाव  किया  जाता हैँ  बाकी  की  कलाकारी इस  कला  से जुडे  कलाकारों के  दिमाग  का खेल  हैँ ....
भगवान  बुद्ध  एवं  उनके  शिष्यों  द्वारा  शुरू  की  गई  इस  कला  का  गहरायी से  अध्यन  कीजिये , पूर्ण  विश्वास हैँ  कि  आप  भी  इस  कला  के सम्मोह  से अछूते  नहीं  रह  पायेंगे ....
दिल  आज  चुप चाप  ही रो पड़ा जब  माँ  ने  कहा  कि  बेटा  अल्मारी में कहीं  कुछ  टंगा  हुआ  हैँ  वोह मेरे जाने  के बाद  तुम  लोग आपस  में  बांट  लेना ,
कितनी  तकलीफ  हुई  मुझे  यह सुन  कर पर मैने  जाहिर नहीं  की ,
क्यूँ  हम  लोग आजकल  धन  दौलत  को  इतनी  तारजीह  देने  लगे  हैँ कि  उनके  आगे  माँ  बाप  का  साथ  और आशीर्वाद  भी  कम  लगने  लगता  हैँ ....
क्या  करेंगे  इन  ऐश ओ  आराम  का  जब परिवार  ही नहीं  होगा , माँ  की गोद  और बाप  का  सर  पर  हाथ नहीं होगा ....
चाह  कर  भी आज  हम  अपने  माँ  बाप  को  वोह नहीं दे  पाते जो कभी बचपन  में  हमें  यूँ  ही  बिन  बोले  मिल  जाया  करता  था ....
सच  में  हम  दिल  दिमाग  और जेब  से कितने रीते  हो गये  हैँ ....
मेरी कच्ची  पक्की  कलम  आज कच्ची  ही  रह  जायेगी  अगर  मैनें  Daddy  के  लिए कुछ नहीं लिखा ,
पेशे  से डॉक्टर,सरकारी  महाकमे  में  उच्च पदासीन ,
पर  ना  जाने  क्यूँ  हमारी  कभी बनी  नहीं ,
विचारों  का मतभेद हमेशा  रहा ....
उनकी  easy going  life style  कभी  समझ नहीं आया  हालाकिँ कभी कोई काम  pending  रहा  हो उनका  ऐसा याद  भी नहीं ....
Office  जाते  थे अपने  पसंदिदा  सफारी  सुट में ,और सार्दियों  में  mummy  बड़े  प्यार  से कोई प्यारा  सा  फूल  सजा देती  थी  उनके coat  पर ,
शायद  यह पेड़ पौधों का प्रेम ,फूल  पत्ती  से  लगाव  उनके  ज़रिये  ही मेरे अंदर  आया  हैँ ,
एक से एक  गुलाब  की  cutting  बांधा  करते  थे ,
खाने  के भी  बेहद शौकीन ,
मथुरा के  हैँ  तो पक्के  खाने  के बेहद शौकीन  हैँ ,
आज भी मीठा  और पूरी  के लिए शौक  वैसा  ही हैँ ,
आज  90 साल  की  अवस्था  में  जो व्यक्ति  पूरा  उत्तर  प्रदेश  की चिकित्सा  व्यवस्था  संभालता  था , खुद  अपने  को  नहीं संभाल  पा  रहा .....
छोटी  छोटी  बातें  भूल  जाते  हैँ ,
जब  कई  कई बार  बताने  के बाद भी  नहीं  समझ  पाते  तो कहीं  किसी  diary  में  लिखने  की  कोशिश  करते हैँ ,
एक  आँख  में  रोशनी  नहीं  रही ,
Diabetic भी  हैँ ,
Blood pressure भी high  रहता हैँ  पर  सब  से  ज्यादा  परेशान  रहते  हैँ  पेट  से ....
किस  किस  दिन  Laxative  मिलेगा  यह  अच्छे  से याद  रहता  हैँ ....
जैसे किसी बच्चे  को  मनचाही  कोई  खट्टी मीठी  गोली  मिलनी हो ....
विगत  कुछ  वर्षों  से उनको  देखने  का  ज़िम्मा  मेरा  हैँ ,
आश्चर्य हैँ  कि  जो व्यक्ति  कभी  किसी  की  नहीं  सुनता  था  आज  वोह इतना  सीधा  और  सरल  हो गया कि  मेरी एक  आवाज  उनको  बता  देती  हैँ  कि  क्या  करना  हैँ क्या  नहीं ,
वास्ताव  में  बुड़ा  होने के साथ  साथ आदमी  बच्चा  ही हो जाता  हैँ  और रिश्ते  स्वत : ही बदल जाते हैँ ...
बाप  बच्चा  और  बच्चा  बाप  हो जाता  हैँ ....
यह लेख  कभी भी खत्म  नहीं  होगा  इतना  कुछ  हैँ  लिखने  को  पर  कब  तक  लिखूँगा ....
बस  यह जान  लिजिये  कि  अगर  घर  में  कोई बुजुर्ग हैँ  तो उनको  किसी विरासात  की  तरह  संभाल  कर  तिजोरी  में  रखें ,
ना  जाने  कब  यह अमानत आपके  हाथ  से  निकल  जायेगी  और  आप  रह  जायेंगे  खाली  और  रीते  हाथ.... 
Happy Father's Day
"आम " आम  ही रहा , बिचारा  खास  ना  हो पाया ....
गर्मी  के  मौसम  में  और  कुछ  हो चाहे  ना  हो आम  का होना  तो लाजिमी  हैँ ,
हर  वर्ग  का  व्यक्ति  इस  से अछूता  नहीं  रह  पाता ,
ठेले  और  मंडियो  में  सजे  तरह  तरह  के आम  अपनी  ओर  खीच  ही लेते हैँ ....
खास  बात  हैँ कि  यह हर  वर्ग  की पसंद  हैँ ,गरीब  से  लेकर  अमीर  तक  इसके  रस  और  गूदे  के  दीवाने  रहते  हैँ ,
भारत  वर्ष  में  तो यह  सामूहिक  खान  पान  का भी एक अभिन्न  अंग  हैँ ....
Summer Holidays आते  ही बच्चें  नानिहाल  पहुचं  जाते  हैँ  और  लग  जाती  हैँ duty नाना  य़ा  मामा  की , बाजार  से चुन चुन कर आम  लाने  की ,
फिर एक बड़ी  बाल्टी  में  पानी  भर  कर  उस  में  आम  ठंडे  किये  जाते  और  चारो  ओर  से घेरे  हुए  चढढी  बानियान  में  सजे  बच्चों  की  फौज  में  बांट  दिये  जाते ,
चुसते ,चाटते य़ा  फिर काट  काट  कर  खाते  कब  आम  खत्म  हो जाते  पता  ही नहीं चलता  था ,
इसी  के साथ  साथ नानी  की कहानियों का  दौर  भी बादस्तुर चलता  ही रहता  था ....
पहली  बार कपड़ो के  दाग  माँ  को भी परेशान  नहीं करते थे ,
आम  का  आचार और  पूरी  य़ा  पराठा  आज  भी भारतीय  रेल  में  खाया  जाने  वाला  प्राचींतम भारतीय  भोजन  होगा ऐसा मेरा दावा  हैँ ....
बस  इसी  लिए  यह फलों  का  राजा  बस " आम " ही  रहा  कभी  खास  नहीं  हो पाया ....
यादें ,
भूल  जाती  हैँ ...
यादें  ही बहुत याद  आती  हैँ ....
आज  भी जब याद  करता  हूँ  24th September 2002 का  वोह दिन  तो जैसे किसी फिल्म  की  रील  सी घूम  जाती  हैँ  आँखो  के सामने ,
नानी  अपनी  बूढ़ी  ज़र्जर काया  को लेकर  सरकारी  Ambulance  मे  मुरादाबाद  से लखनऊ तक  का सफर  16 घंटे  मे  तय  कर  के  आयी ,
घड़ी  आखिरी  हैँ  यह शायद  वोह समझ  गई  थी ,
फिर भी आंखे  बंद  होने से पहले  एक बार  एकलौती  संतान  को देखने  का मोह  उनको  यहाँ  तक ले  आया  था ....
घर  की दहलीज पार  कर  के जैसे ही उन्होने  माँ  को देखा और  बस  हमेशा  के लिए  आंखे  मूंद  ली ...और निकल ली अजर अमर य़ात्रा पर ....
उसके  बाद  सारे  रीती  रिवाज  शुरू  हुए ,
नाना  की कमर जैसे  कुछ  ही समय  मैं और  भी झूक  गई  थी ....
शमशान  मे  चिता  के ऊपर  लेटी  नानी , सूती  साड़ी  में  बेहद शांत  और  गारिमामई लग  रही  थी ....
पंडित  ने सारे  विधी  विधान  किये  और  मुखागिनी  देने  से पहले  पंडित जी नाना  से बोले  बाबू  जी देख  लिजिये  माता  जी को  आखिरी  बार ....
नाना  बेचारे  जैसे  तैसे  कर  के  नानी  तक  आये और  गोरे  पर  बर्फ से  भी ज्यादा  ठंडे  पड़ गये  चेहरे  को  झूरियों  वाले  हाथों  मे  भर  कर  बड़े  प्यार  से  सहलाते  हुए  बोले ....
अच्छा  भाई ,
जा  रही  हो तुम .....
इतने  साल  बीत  गये  पर  यह वाक्य  आज  भी बोलते  हुए  मेरी  आँखे  नम  और  आवाज  भर्रा  जाती  हैँ ...
और  नानी  की वोह चिरपरिचित  आवाज  कानों  में  गूजनें  लगती हैँ ...
पंकज  
अरे  ओ  पंकज .....
जीवन  में  Communication  एवं  Expression के  अर्थ  और  महत्ता को  समझिये ,
जीवन  के  कई  पहलू  और  समस्यायें  केवल इस लिए  हैँ  कि  हम  किसी  से  कुछ  कहते  नहीं  हैँ ,
सोचते  हैं  कि  केवल  हम  ही  इस  पीड़ा  को  झेल  रहें  हैँ ,
जबकि  ऐसा  नहीं  होता एक  उम्र  वालों  की  समस्यायें  भी  लगभग  एक  सी  ही  होती  हैँ ,
केवल आपको घर  का  दरवाजा खोल  कर  बाहर  आना  हैं  और  आप  पायेंगे  कि  आप  बाकी  लोगो  की  अपेक्षा  में  ज्यादा  सुखी  और  सम्रद्ध  हैं ,
यकीन  मानिये  आपको  कोई  सहारा  मिले  या  ना  मिले  पर  आप  किसी  का  सहारा  जरूर  बन  सकते  हैँ ....
तो फिर यह  पहल  आज  से  ही  क्यूँ  नहीं ....
बरसो पहले कभी पढ़ी हुई हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका गौरा  पन्त शिवानी की लिखी हुई कथा साध्वी यूँ आँखों के आगे जिवंत हो जाएगी सोचा न था.… 
वही जंगल का बीहड़ …
दुर्गम राहे ....
जीवन का एकाकीपन...
और उस पर अपने अस्तित्व को और भी रहस्मयी बनती हुई वोह साध्वी…. 
उसका वोह मरदाना सा अस्तित्व…जोगिया वस्त्रो में और भी रहस्मई लग रहा था…. 
सही कहू  तो मैं आँख भर कर  उनको देखने का साहस  भी नहीं कर पाया…. 
कि कही उन लाल आँखों में  जिनमें उनके तप  की आग थी या किसी गांजे का धुआ…. की अग्नि मुझे भस्म न कर दे ….बस इसी  सोच और भय के संग मन के अंदर सवालो की पोटली को यूँ ही बांधे हुए मैं वापिस चला आया… 
पर  यह समझ गया की उपन्यासों के चरित्र हमारे रोजमर्रा के जीवन के इर्द गिर्द से ही लिए जाते और जीवित किये जाते है ….
कई हफ्ते नहीं शायद कई महिनों  दिल को समझाया ,रूठे  साथी की तरह मनाया ,  कहा कि बस 20 मिनट की ही तो बात है ,मान जाओ न Please.....
खैर इतनी मान मनौअल के बाद मेरा दिल राज़ी हुआ ,सुबह सुबह Morning walk पर जाने के लिये ....
हालांकि कोई भी ऐसा EXAMPLE मुझे नहीं दीख रहा था जिस  देख कर कह सकूँ कि  वह इस ने तो कमाल कर दिया ....
क्या कसा  हुआ बदन हो गया इस का ...
दिख रहे थे तो वही थुल थुल लटकते हुए पेट ,हांफती हुई साँसे ,गिरती पड़ती भागती हुई जर्जर इमारतें ....
हां यह अवश्य था की मेरे कलाकार मन को इन सब के बीच में से चुन कर  निकलने को बहुत कुछ मिला ...
जहाँ कुछ जवान जोड़े रात की खुमारी आँखों लिए और हाथ में हाथ लिए ,खरामा खरामा घुमते टहलते नज़र आये वही अधेड़ अवस्था के जोड़े सब से ज्यादा हास्यास्पद थे ....
बस कहने को संग थे पर शौहर अपनी बीबी की अपेक्षा दूसरे की बीबी के ज्यादा नज़दीक चल रहा था पर  हां यह जरूर था की बीच बीच में  मुड़ कर  यह जरूर देख लेता था की बीबी आ रही है की नहीं ....अब शायद इस का कारण यह   भी हो सकता है की वह बीबी की दूरी  नाप कर अपनी नज़दीकियां बढ़ाना चाह रहा हो ....
कुछ भी हो सकता है ....इस उम्र की मर्दजात बहुत ही कमीनी हो जाती है। 
परन्तु सब से सुखद अहसास था उन चमकीली सफ़ेद रेशम से लहलहाते बालो के बीच में  से झांकती हुई उन पवित्र झुर्रियों को देखने का जो आज भी हाथ में  हाथ पकड़े एक दूसरे का सहारा बने जीवन पथ की दुर्गम राहों  पर चलते जा रहे थे , उनके चेहरों की दिव्य मुस्कान सुबह को और भी सुरमई बना रही थी , अपने आप को मैंने धन्यवाद दिया की अगर मैं अपने दिल को न मनाता तब शायद आज इस सुख से वंचित रह जाता ,हां पर  इन्ही सब बातो के बीच एक बात समझ मैं नहीं आई की यह MORNING WALK पर  निकले हुए UNCLE लोग अपने हाथों में हर  आकर और प्रकार के डंडे क्यों रखते है......
जीवन में  जिस  ने आपको  माँ  बोलना  सिखाया  या  फिर ABCD  से परिचित  कराया वहीं  आपका  गुरु  हो ऐसा  ज़रूरी  नहीं ,
जीवन  में  आये  उन  गुरु  को भी नमन  करें  ज़िन्होने  आपको  cigrette  का  पहला  कश  लेना  सिखाया ,
दारू  के संग  चखना कितना  अहम  होता  हैँ  वोह कांधे  पर  बड़े  प्यार  से हाथ  रख  कर  मुफत  में  यूँ  ही समझाया ....
बालिग  होते  वक़्त  की  दुरूह  ग्रंथियो  को  धीरे  धीरे  बड़े  ही प्यार  से सुलझाया ....
नमन  करता  हूँ  आज  ऐसे  सभी जीवन  में  गुरु  लोगों  को  ज़िन्होने  सीटी  बजाने  की  अद्भूत  कला  से अवगत कराया ,
सीटी  कितने  प्रकार  की  होती  हैँ  यह भी बताया ....
लड़की को  देख  कर  बजाने  वाली  सीटी ,
जानवारों  को  देख  कर  बजाने  वाली ,
तोते  वाली  सीटी  और  भी नाना  प्रकार  की सीटी ....
तेज  गती  से  चल  रही  Scooter  पर  कैसे  आगे  से  पीछे  य़ा  पीछे  से आगे आया  जाये  यह भी  बताने  से नहीं  चूके ...
किताबी अध्यन  तो आप  अपनी  बढ़ती  उम्र  और  अपने  अध्यन  के छेत्र  के  हिसाब  से भूल  या  फिर याद  रख  सकते  हैँ ..
परंतु  उपरोक्त  ग्यान ( i know the spelling is wrong but can't help it....)आप  चाह  कर  भी नहीं भूल  पायेंगे ....
यह  ठीक  वैसे  ही हैँ  जैसे  जीवन  में  cycle  चलाना  सीखना ,
सीख  लिया  तो कभी  भूले  ही  नहीं ....
चाहे  केची  चालाई चाहे गद्धी  पर ...
इसी  लिए कहा  गया  हैँ  कि  मित्र  से अच्छा  कोई गुरु नहीं ....
हर  कमिने मित्र  को  Teacher's day की  बधाई...
बात है तकरीबन 8 से 10 साल पुरानी....
नया नया इंटरनेट के माध्यम से सोशल साइट्स पर जा कर अनजान पर एक जैसी सोच रखने वाले व्यक्तियों से दोस्ती करने का रुझान विकसित हो रहा था। 
इसी दौरान एक सुदूर प्रान्त पश्चिमी बंगाल के एक अनजान व्यक्ति से मित्रता हुई ......
मित्रता समय के संग सोशल  साइट्स से बढ़ कर फ़ोन तक पहुची पर उसके चेहरे से मैं अभी भी अनजान था ...
घंटो विचारो का आदान प्रदान होता ....समस्याए ,खुशिया जीत और हार सब साझा की जाती पर  दिखने मैं वोह कैसा है यह अभी भी केवल कल्पित ही था .....
फिर एक समय ऐसा भी आया की वोह मेरा सब से अच्छा  दोस्त बन गया .....पर मैं चाह कर  भी उस को भीड़ मैं नहीं ढूंढ सकता था क्यूंकि मैं तो केवल उसकी आवाज़ से परिचित था ....उस के चेहरे से नहीं ....फिर एक दिन मैंने अपनी रूचि के अनुसार उस आवाज़ को एक चेहरा देकर उस शख्सियत को मुक्कमल कर दिया .....
कई माह ऐसे ही चला ...
फिर मेरी चित्र प्रदर्शनियों के दौरान मुझे उसके शहर जाने का मौका मिला और हम पहली बार एक दुसरे के रूबरू हुए ....
और शायद हम दोनों ने आवाजों के लिहाज़ से एक दुसरे को कुछ ज्यादा ही गलत चेहरे दे दिए थे....
फिर यही 
 सोचते रहे की अगर हमारी मुलाकात केवल टेलीफोन तक ही सिमटी रहती तो शायद ज्यादा अच्छा होता..
यह किस्सा साझा इस लिए किया क्यूँ की 
लखनऊ बुक क्लब की मासिक गोष्टी में इसी से मिलती जुलती Annie Zaidi. की एक कहानी चर्चा का विषय बनी थी ......
ह्रदय  अघात  के उपरांत  बिस्तर  प़र  लेटे  लेटे  जब  बोर  होने लगा  तो एक प्रिये  मित्र  द्वारा  दी  गई  कुछ  पुस्तकों  की  ओर  मुख  घुमाया  तो खुशवांत सिंह  की " औरतें " एक दिलचास्प option  लगा ,
255 पृष्टों  की मोटी  ज़िल्द  चड़ी किताब  को जब  हाथ में  लिया और  पढ़ना  शुरू  किया  तो समझ  आ  गया  कि  यह एक  सही  चुनाव  साबित  होगा , खराब  वक़्त  को काटने  में....
धीरे  धीरे खुशवांत  सिंह  की चिरपरीचित  लेखन  कला  जो कि  कभी  कभी मस्त राम  की  लेखनी  को भी पीछे  छोड़  देती  हैं  ने अपना  प्रभाव  छोड़ना  शुरू  किया  और  मुझे पुस्तक  के आखिरी  प्रष्ठ  प़र  मेरी उम्मीद  के विपरीत  जल्दी  ही पहुचां दिया ....
खैर  कथा  वस्तु  क्या  थी  क्या  नहीं  यह  तो जाने  दिजिये  परंतु  मैं  यह  जरूर  जानना चाहूँगा  कि  कथा  का  नायक  एक उच्च  वर्गिये करीब  40 वर्ष  का युवक  हैं ...
पढ़ा लिखा ,सुसंसकृत और सभ्य ....
प़र  जिस  तरह  से उसको  गढ़ा गया  हैं  वहां  वोह बेहद लम्पट ,कामपिपासु  और  व्याभिचारी  लगता  हैं ....
क्या  हर  भारतीय  पुरूष  इतना  ही  कामातुर  होता हैं  य़ा  खुशवांत  सिंघ ने अपनी  83 साल  की अवस्था में  बहुत कुछ चाह  कर  भी ना  कर  पाने  का  विशाद  इस  मोहन  कुमार  नामक  युवक  के  सर  मड़ कर  अपने  आप  को  संतुष्ट  किया  हैं .....
अवध -
कला  एवं  संस्कृती  का केन्द्र बिन्दु  रहा  परंतु आश्चर्या  का विषय  हैं कि  इस  में  कही  भी चित्रकारी  के सम्बंध  में  ना  के बराबर  कुछ  लिखा  य़ा कहा  गया  हैं ....
अवध में  प्रारम्भीक  चित्र  शेली  में  योगदान  रहा  कुछ दिल्ली  सलतनत के मुग़ल  कालिन  चित्रकारों  का ,
ज़िन्होने  लखनऊ आकर  स्थानीये कलाकारों के  सहयोग  से कुछ चित्र  अंकित  किये , कभी कभी दोनों  चित्रकारों  ने मिल  कर  एक ही  चित्र  पर  कार्य  किया जोकि  एक दुष्कर कार्य  हैं किसी  भी कलाकार के  लिए  क्यूंकी  हर  चित्रकार  य़ा  कलाकार अपनी  व्यकिगत  सोच  के अधार  पर  किसी  कला  की सरचना करता  हैं ....
तत  कालीन  चित्रों  में  मुगल  कालीन  चित्र  शेली  का प्रभाव  स्पष्ट रुप  से देखा  जा  सकता हैं ,
तदूपरांत भारत  वर्ष  कम्पनी राज्य  अपनी  जडे  ज़मा  रहा  था  और  समान्य  जन जीवन  , संस्कृती  में  एक  बदलाव दिखाई  देने  लगा  था , यहीं  वोह समय  था  जब  बादशाह  नसीरुद्धिन  हैदर जोकि  बादशाह  गाजिउद्धिन  हैदर  के  बेटे  थे, के शासन काल  में अवध  में  होने  वाली  चित्रकला  में  कुछ  यूरोपियन कलाकारों ने  अपनी  भागीदारी  दर्ज कराई और  स्थानिये  कलाकारों  के सहयोग  से एक  नई  शेली  का जन्म  हुआ  ज़िसे  "कंपनी स्कूल  ऑफ  आर्ट " के  नाम से  जाना  गया ,
इस  शेली  में राजपूत ,मुगल  और  यूरोपियन कला  सब  कलाओं  का संगम  स्पष्ट  रुप  से देखा  जा  सकता हैं ,
यह चित्रकला मुख्यता  कागज पर  ही ऊकेरी  गई  जबकि  कुछ  चित्रों  में  हाथी  दांत  का भी उपयोग  हुआ  हैं .
उपरोक्त  चित्रकला  18वी  एवं  19वी  सदी में   एक  प्रचिलित  चित्रकला  रही  और  नवाब  वाजीद  अली  शाह  के   शासान  काल  में  अपने  उच्चतम  मुकाम  तक  पहुची .
इसके  पश्चआत  लखनऊ , लखनऊ के  नवाब , बेगम ,आलिशान  ईमारतों , हवेलियों , समान्य  जन  जीवन  को  देश  भर  के चित्रकारों  ने  अपनी  अपनी  कल्पना  की  उडान  और  रंग  दिये ...
कुछ नए  और  खूबसुरत  प्रयोग  भी किये  जो कि  Mixed Media के  नाम  से जाने  गए ,
परंतु  इतना  सब  कुछ होने के बाद  भी , आज भी  यूँ  लगता  हैं  कि इस  खूबसुरत  शहर को  हमनें  चाहे  ज़ितना  भी अपने  कला  के दायेरे  में  समेटा  हो , कहीं  कुछ  छूट  सा  गया  हैं , मानो  कहीं  कोई  उदास  और  बेकरार  बैठा  हुआ  हैं  किसी  कलाकार  की तलाश  में  कि  कभी तो कोई आयेगा  और  समय  की धूल  को  हटा  कर  , फीके  पड़  गए  रंगो  में  जीवन  के नए  और चटक  रंग  भर  देगा ....
52 वर्ष  की अवस्था ,
और  स्मरतियों  का भंडार ....
परंतु  शायद  हमारी  पीढी उन  भाग्यवान  पीढी में  से हैं  ज़िनके  पास  कुछ  यादें  तो हैं ....
आजकल  के बच्चों  के जैसे रीते  हाथ  तो नहीं हैं ....
पिता जी एक चिकित्सक  हैं , सरकारी  नौकरी  थी , महीने  की  बंधी  बंधाई  रकम  ही घर में  आती थी , और  माँ  उस में  से ही विधिवत  पूरे  घर  का संचालन करती  थी ....
पिताजी  हमेशा  से बहुत ही Easygoing रहें , कभी भी आतिरिक्त  रकम  के लिए उसके  पीछे नहीं भागे ,
जो मिल गया ,
बहुत मिल गया ....
आज भी याद हैं  जब सार्दियों  के आते  ही हम तीनों  भाई बहन सूती छापेदार  रजाई में  माँ और  पिता  जी के साथ बैठ  जाते थे और  कपोल  कल्पित  किस्सों  के साथ माँ  एक स्टील  का डब्बा  जोकि  मेवा  से भरा  होता  था  हम  सब के बीच में  रख  कर  खोल  देती  थी ...
सीमित  आय  में  भी यह  Luxury  वोह  किस  प्रकार  हमको  देती थी  यह वही  जानती  होगी ....
किस्से  कहानियों  के  बीच कब मुट्ठी  भर भर कर हम सब  वोह डिब्बा  खाली  कर  देते  थे  , पता  ही नहीं चलता  था ....
वोह रजाई  की गर्मी  और  माता  पिता का प्रेम हमारे  जीवन  की सारी  रिक्ताओं  को  दूर करके  हमें  हमारें  भविष्य  के  लिए आशवस्त  कर देता था ....
अब आज  कल की दुनिया  में  यह सब कहाँ  मिलता  हैं ...
मेवों  से ज्यादा  महंगे  हो गये  हैं  आजकल  के  रिश्ते .....
बात 2009 दिसंबर की हैं ,
पहला  ह्रदयघात  हुआ था मुझे  और  मैं  lifeline hospital के  ICU  में  भरती  था ....
ICU का दम  घोटू  माहौल ,और  ना  जाने  वहां  घड़ी  क्यूँ  नहीं  होती ...
वक़्त  का  पता  ही नहीं चलता ....
ठंडे  सफेद  बिस्तर  और  भी खौफनाक  लगते  हैं ....
खैर  दीवारों  से बात  करके  मैं  अपने  दिन  निकाल  रहा  था  कि  तभी  जोरदार  आवाज  के साथ  ICU का दरवाजा  खुला , और  लोगों  का  ज़त्था पूरे  खाली  कमरे में  भर  गया ...
शांत  माहौल  रूदन में  बदल गया ... 
एक  दादा  जी भरती  हुए थे ,
सीने  का दर्द  ले  कर ....
उम्र  देखते हुए  नाते रिश्ते  के लोगों  ने समझा  कि  बेला  आ  गई ,
बहुओं  ने सर  ढक कर  चिर  सुहागन होने  का  आशीर्वाद  मांगा ...
नाती  पोतों  ने  फेसबुक  के लिए फोटो  खीचें ....
मसला  इतना  दुखद  लगा कि  मुझ  से देखा  नहीं गया  और  मैनें  खुद  को  परदों  के  पीछे  छिपा  लिया ....
आवाजें  फिर भी आती  रही ...
दादा  जी पूरी  तरह  से म्रत्यु श्यया  पर  थे ....
तभी दादा  जी से पूछा  गया  कि  कुछ खायेंगे  आप ...
दादा  जी ने गर्म  दूध  में  डबल रोटी  डाल  कर  खाने  की इच्छा  जताई ...
आनन फानन उनकी  इच्छा  पूरी  की  गई ....
सीने  का दर्द  अभी भी बना हुआ था ....
कटोरा  भर  खत्म  होते होते  एक जोरदार  आवाज  से कमरा  गूंज  गया .... 
रोना अब  हसीं  में  बदल चुका  था ....
पता  चला  कि  दादा  जी  की  हवा  खुल  गई .....
कल रात लखनऊ बुक क्लब की मीटिंग से लौटने के बाद ...
 मैंने  यूँ ही अचानक अपनी पत्नी से जब पूछा कि अगर अगला जनम है तब वोह क्या दोबारा स्त्री बनना चाहेगी ...
उसका उतर था ...नहीं।
क्यूंकि वोह उन सब सीमाओं  को लाघना चाहती है जो स्त्रियों के लिए ही जैसे बनी है ....
मेरे पूछने पर  की ऐसा कौन सा काम है जो आज महिलाये नहीं कर रही है ....
कनक जी की तरह उस का भी जवाब था कि  रात को बाहर अकेले नहीं जा सकते ....
चाय/कॉफ़ी पीने .
हम शादी शुदा मर्दों मैं भी शादी के बाद कहाँ यह हिम्मत बचती है की बिना कोई बहाना  बनाये यूँ ही आवारगी के लिए चंद कदम भी निकल जाए ....
जब उस ने यहीं सवाल मेरे से किया तब मैं तो जैसे तेयार  बैठा था अपने जवाबो की पोटली बांधे हुए ...
बिना 1 भी पल गवाए मैंने गांठे खोलनी शुरू कर दी ...
हाँ ..
मैं स्त्री बनना चाहूँगा...
पत्नी को हैरत हुई ...ऐसा क्यूँ ..
कारन था मेरे पास .....
मैं मातृत्व के उस सुख को भोगना चाहता हू जिस को प्रभु के समक्ष समझा जाता है ...
मैं उस सुख को जीना चाहता हूँ  जो 1 नए जीवन को धरती पर लाने  का होता है ....
कैसी होती है वोह विलक्षण अनुभूति इस का आभास करना चाहता  हूँ ....
हाँ , मैं  पूरा जीवन जीना चाहता हूँ.....
गुरु रविंद्रनाथ टैगोर की लघु कथा "काबुलीवाला " का एक अंश .......
"उसने अपने कुरते की जेब में हाथ डालकर एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकाला औऱ बड़े जतन से उसकी चारों तह खोलकर दोनो हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया। देखा कि कागज के उस टुकड़े पर एक नन्हें से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप हैं। हाथ में थोड़ी-सी कालिख लगाकर, कागज़ पर उसी की छाप ले  ली गई थी। अपनी बेटी इस याद को छाती से लगाकर, रहमत हर साल कलकत्ते के गली-कूचों में सौदा बेचने के लिए आता है...."
मुझे याद दिला  गया एक छोटा सा पर  बेहद खूबसूरत वाक्या  मेरे और मेरी बेटी के जीवन का ....
तब मेरी बेटी कोई 4-5 बरस की होगी....
उस के स्कूल में भी उसके नन्हे नन्हे हाथो की छाप ली गई थी ...
1 सादे से कागज़ के पुर्जे पर .....
कुछ बहुत ही खुबसूरत सी पंक्तिया लिखी थी .....
जिनका अर्थ था की पापा जब मैं बड़ी हो जाउंगी और आप से दूर हो जाउंगी तब  मेरे हाथो की यह छाप आप को ये ही याद दिलाएगी की मै आज भी आप की वही छोटी सी बिटिया हूँ  जो आप ही के आंगन में  खेली और एक चिड़िया की तरह चहकी है .....
बदकिस्मती से मैंने वोह कागज़ का पुर्जा कही खो दिया....
पर   उसकी याद दिल में संजो ली....
31 मार्च  1957,
जब  Daddy , Mummy को देखने  के  लिए  गये , अपने  पिता  जी  एवं  बड़े  भाई  के साथ ....
आज  मम्मी  ने  यूँ  ही  अपने  यादों  का  पिटारा  हम  सब  के सम्मुख  खोल  दिया ,
चूकें  मम्मी नाना  नानी  की  एकलौती  संतान  हैं , तब  मम्मी को  शादी  के  लिए  दिखाने  ले  जाते  वक़्त  नाना  ने  गिनती  3 को अशुभ  मानते  हुए  अपने  एक नौकर को  भी साथ  ले  लिया और  जा  पहुचें  दिल्ली  के  किसी  होटल  ताज  में ...
यह  5 सितारा  वाला  होटल  ताज  ना  हो कर  कोई यूँ  ही नाम  भर  का  होटल  ताज  था ...
ताज्जुब  होता  हैं कि  कैसे मम्मी को  एक एक बात  आज  तक  याद  हैं  इतने  साल  गुजर जाने  के बाद  भी ....
खैर  देखने  दिखाने  का  पाराम्परिक रस्म हुई ,
इसी  बीच  daddy  और  mummy  को बात करने  का  मौका  मिला  और  Daddy  ने  डॉक्टर  होने  के नाते  Mummy  से पूछा  कि  क्या  कभी चेहरे  के  मुहासों का  इलाज  नहीं  कराया ....
Mummy  ने  भी  तापाक से नहले  पर  दहला मारा  और  बोला  कि  आप  तो डॉक्टर  हैं  आप  ही  कुछ बतायें ....
Daddy ने  एक  गहरी  नज़र  Mummy  पर  डालते  हुए  कहा  कि बाद  में  जरूर  बतायेंगे   ....
इसी  जरूर  बतायेंगे को  Mummy  ने  सहमती  मानते  हुए   शर्मा  कर अपनी  नजरें झुका  ली ....