Wednesday, December 15, 2021

Old time Memories

एक  मित्र द्वारा लिखित 1 लेख पढने का सौभाग्य मिला...
बिलकुल सही लिखा है ...जीवन की आपा धापी मैं हम यह छोटे छोटे सुखों को भूलते जा रहे है...
मुझे आज जीवन के 55 वर्ष पूरे  करने के बाद भी वोह सुखद अनुभूती याद है ...जब जिला फरुक्खाबाद मैं मेरे पिता जी 1 सरकारी पद पर  आसीन थे ..और हम सब उस छोटे से मगर बेहद खुबसूरत शहर मैं बने हुए 1 फट्टा टाकीज़ में  जाया करते थे.....चूकें मेरे पिता जी 1 ऊँचे सरकारी पद पर  आसीन थे...अतः हम लोगो को कभी भी धुल के गुबार के बीच टिकेट खरदीने का सौभाग्य नहीं मिला ....यह काम हमेशा हमारे प्रिय काका जिनका नाम शायद इल्याज़ था किया करते थे ...फिर आती थी वोह शाम जिस का हम सब मैं और मेरी बहन व भाई इंतज़ार किया करते थे ...शाम होते होते हमारे सारे  मित्रो को पता चल जाता था कि हम सब सलीमा देखने जा रहे है ...बड़ी सी गाड़ी को साफ़ सुथरा कर के निकाला जाता था ...हम सब अपने खुबसूरत लिबासो में ऐसे सज जाते थे जैसे किसी विवाह समारोह में  जा रहे हो ...
भीड़ में जा कर  गाड़ी का रुकना ...लोगो का कौतुहल पूर्वक हम सब को देखना ...और 1 ख़ास होने का अहसास लिए हुए हम सब का उस फट्टा टाकीज में दाखिल होना ....
फिर शुरू होती थी घिर घिर की आवाज़ के साथ पीले पड़  चुके परदे पर रंग बिरंगी आक्रतियो का रंगा  रंग कार्यक्रम ....गर्मी हो तो बहता पसीना...बारिश होती हो..तो टिप टिप करती बूँदे ...और जाड़ा  हो तो तेज़ गति से आती सर्द हवाए टाट के उस परदे को बेपर्दा कर के हम  सब को सड़क पर  होने वाले तमाशो से भी अवगत कराती चलती .... 
इसी बीच अगर कोई गाना आ जाये तो पूछिए मत ....इतने स्वर और सीटी  baj जाती कि कानो को कई बार बंद करना पड़  जाता था ...
फिर बीच बीच मैं मम्मी के द्वारा बनाये गए आलू के परोठो के संग आम का अचार ...1000रुपया खर्च कर  के खरीदे गए pop corns...nacho...etc..मुंह में वोह स्वाद नहीं घोल सकते .
फिर अंत होते होते नींद अपने पूरे जोरो पर  आने लगती थी....कई बार तो मम्मी की गोदी ही तकिया बन जाती थी ...और बहन की गोदी पैताना ....
फिर कब डैडी उठा गोदी मैं उठा कर घर ले आते .....याद भी नहीं रहता...याद रहता तो मानस पटल पर  अंकित वही रंग बिरंगे रंग...तेज़ आवाज़ से गूंजता संगीत....जो आने वाले अगले कई रातो के सुंदर सपनो का पसंदीदा विषय रहता.....

Saturday, December 4, 2021

आस पास देखता हूँ  तो हम सब 50+ की अवस्था  वाले  एक जैसी ही मानसिक  अवस्था  में नज़र  आते  हैं ,
सालों  पहले  जो तिनका  तिनका  जोड़  कर  एक आशियाना  बनाया  था  आज वोह धीरे  धीरे  बिखरता नज़र  आ रहा  हैं , उम्र  के साथ  स्वास्थ  अब कुछ ज्यादा ठीक  नहीं  रहता , सब  कुछ ही digital होता  जा  रहा  हैं , अब बूड़ा  तोता  कितना  राम  राम  बोलना  सिखेगा ,अभी  तो बच्चें  हैं  तो बहुत  कुछ काम  कर  देते  हैं , बच्चें  अपने  पंख  पसार  रहें  हैं , उनकी  अपनी  नई  मांजिले  हैं , ऊँची  उड़ान  हैं ....
पैसों  और  भविष्य  की चकाचौंध हैं ,
लखनऊ  उनके सपनों  का  शहर  नहीं  हैं ....
और  एक हम लोग हैं  जो लखनऊ से अपने  को अलग देख ही नहीं सकते ,
बच्चों  की तरक्की के रास्ते  में  रोड़ा  बनना  हमारा  निजी  स्वार्थ  होगा ,
वोह बाहर  जायेंगे  ही  और  जाना  भी चाहिए ....
फिर क्या  किया  जायें ,
समाधान  सरल  हैं ,
अपने  अपने  घर  और  दिल  के दरवाजे खोलिये , आस पास  के लोगों  से हाथ  नहीं दिल  मिलायें ,
और  फिर से एक कभी ना  बिखरने  वाला अपना  घर  बनायें ....

Tuesday, November 23, 2021

55 वर्ष  की अवस्था ,
और  स्मरतियों  का भंडार ....
परंतु  शायद  हमारी  पीढी उन  भाग्यवान  पीढी में  से हैं  ज़िनके  पास  कुछ  यादें  तो हैं ....
आजकल  के बच्चों  के जैसे रीते  हाथ  तो नहीं हैं ....
पिता जी एक  चिकित्सक थे  , सरकारी  नौकरी  थी , महीने  की  बंधी  बंधाई  रकम  ही घर में  आती थी , और  माँ  उस में  से ही विधिवत  पूरे  घर  का संचालन करती  थी ....
पिताजी  हमेशा  से बहुत ही Easygoing रहें , कभी भी आतिरिक्त  रकम  के लिए उसके  पीछे नहीं भागे ,
जो मिल गया ,
बहुत मिल गया ....
आज भी याद हैं  जब सार्दियों  के आते  ही हम तीनों  भाई बहन सूती छापेदार  रजाई में  माँ और  पिता  जी के साथ बैठ  जाते थे और  कपोल  कल्पित  किस्सों  के साथ माँ  एक स्टील  का डब्बा  जोकि  मेवा  से भरा  होता  था  हम  सब के बीच में  रख  कर  खोल  देती  थी ...
सीमित  आय  में  भी यह  Luxury  वोह  किस  प्रकार  हमको  देती थी  यह वही  जानती  होगी ....
किस्से  कहानियों  के  बीच कब मुट्ठी  भर भर कर हम सब  वोह डिब्बा  खाली  कर  देते  थे  , पता  ही नहीं चलता  था ....
वोह रजाई  की गर्मी  और  माता  पिता का प्रेम हमारे  जीवन  की सारी  रिक्ताओं  को  दूर करके  हमें  हमारें  भविष्य  के  लिए आशवस्त  कर देता था ....
अब आज  कल की दुनिया  में  यह सब कहाँ  मिलता  हैं ,
मेवों  से ज्यादा  महंगे  हो गये  हैं  आजकल  के  रिश्ते .....

Sunday, November 21, 2021

Daddy....

बहुत दिनों  बाद  आज दिल कुछ उदास  सा हैं ,
यादें  घूमड़  रहीं  हैं ,
यूँ  ही आज  "सूई  धागा " हिन्दी  चलचित्र  देखा ,
एक Scene में  बेटा  बहुत ज्यादा  भावुक  हो कर  अपने  पिता  के गले लग जाता  हैं ,
बस यहीं  मैं  भी यादों  की हवेली का दरवाजा खोल  कर  भीतर  दाखिल  हो गया ....
यूँ  तो कभी याद नहीं  कि  Daddy ने मुझे गले लगाया  हो , पर  अपने  अंतिम  दिनों  में  जब वोह मेरे ज्यादा करीब  हो गये  थे , तो जब कभी भी मैँ  कहीं बाहर  जाता  तो उनका  जर्जर होता  ज़िस्म  अपनी  बांहो  में  भरता  और  उनको समझाता  कि  Daddy मैँ  जा  रहा हूँ ,
अपना  ध्यान  रखियेगा  और  Mummy की सारी  बातें  मानियेगा ,
किसी  अच्छे बच्चें  की तरह  वोह मेरी बांहो  में सिमट  जाते  और  सहमति में सर  झुका  कर , सर  नीचे  कर  लेते .....
आज  बस उस  पल का  एहसास  रह  गया  हैं I
Daddy जो नहीं रहें ....

Wednesday, July 21, 2021

Fridge

स्यूंक्त  परिवार  में  गहमागहमी कुछ यूँ  ही बढ़ी रहती  हैं  और  कोई शादी  ब्याह  हो  तो कहना  ही क्या ....
यूँ  ही कुछ शादी  ब्याह  था  मेरे दूर  के रिश्ते  के मामा  का ... 
दिन था सगाई  का ,
और  घर  भरा  हुआ  था मेहमानों  से ,
आला  दर्जे की खाने  की खुशबू  से घर  महक  रहा  था ,
देशी  घी  से बनी  सब्जिया  और  खास  बनियों  में  बनने वाली  उड़द दाल  की कचौरी , हम  सब को बार  बार  अपनी  ओर  खीच  रहीं  थी ....
खैर  शाम  होते  होते घर  का  बड़ा  सा  आगंन  मेहमानों  और  सगाई  में  वधू  पक्ष  के घर  से आने  वाले  समानों  से पट  गया .....
अब शुरु हुआ समान  की  लिस्ट  गिनाने  और  बताने  का  सिलसिला ,
ज़िसका  ज़िम्मा  सौंपा  गया  एक पंडित  जी  को , जो नई दुनिया  के  रिती रीवाजो  से एकदम अंजान  थे .....
देखें  दिखाये  समान  जैसे बर्तन भांडे , सोफा , पलंग  इत्यादी  तो पंडित जी  बड़े  आराम  से गिना  गये , बेचारे  फंस  गये  Fridge  पर  आ कर ....
बहुत देर तक  उसको देखते  निहारते  रहें , सोचते  रहें  कि  आखिर  यह हैं  क्या ....
भरी  सभा  में  किसी  से पूछे  कैसे और  इसी  के साथ  ही साथ  अपने  को मूर्ख  भी कैसे साबित  करें ... 
काफी लम्बा  समय  बीत  गया , मेहमानों  में  खुसुर  पुसुर  तेज  होती जा  रहीं थी .. 
कि  आखिर  पंडित जी  चुप्प  क्यूँ  हो गये  ...
उधर  पंडित  जी ने अपनी  बची  खूचीं  हिम्मत  को बटोरा  और  बकरी  की सी मिमयाती  अवाज में  धीरे  से बोला ....
और  एक सफेद  अल्मारी .... 
खुसर  फुसुर  अब अठ्ठास  में  बदल चुकी  थी ....

Friday, May 7, 2021

पेड़ पपिते का ....

कुदरत  का  करिश्मा हैं  या  कुछ  और ...
पेशे  से चिकित्सक ,
पर  पेड़  पौधों  के  बेहद  करीब ....
कैसे  किसकी  cutting  लगायें ,
खाते  time  कोई आम  या  पपिता  मीठा  निकल  गया  तो  तुरंत  वोह   धरती  की  गोद  में  समा जाता था  नये  अंकुरण  के  लिए ... 
मेरी इसी  बात  को  लेकर  उनसे  मतभेद रहता  था ....
मैं  फूल  का  पौधा  लगाता , कुछ वक़्त  बाद  देखता तो  उसकी  सबसे  मोटी  डंडी  कटी  हुई  हैं ,
समझ  जाता  था  कि  यह  काम  किसका  हैं ....
Daddy आपने  फिर  पेड़  की  cutting  की ...
बड़ा  तो होने  देते ....
एकदम  मासूम बच्चे  की  तरह  बोलते  कि  उनका  झूठ  उस  मासूमियत  में  दब  कर  रह  जाता ... 
कौन  सी  cutting,  मैनें तो  देखी  भी  नहीं ....
और  मैं  सब  कुछ जानते  हुए  भी  चुप  हो जाता ....
पपिते के  एक  बार  25 पेड़  लगा  दिये  हमारे  आवास विकास  वाले  घर  के  दायेरे  में ...
25 पेड़ ,
वोह भी  पपिते  के .. 
घर  हैं  या  पपिता  पौधशाला ....
ठीक  यहीं  बोला  था  मैनें  Mummy से ... 
और  सारे  उखाड़  दिये  थे , दिल  को  शांति  मिली  कि  आज  बदला  पूरा  हुआ.....
उनके  प्रस्थान  को 4 माह  पूरे  होने  को  आये .....
यूँ  ही  बागिचे  में  घूमते  हुए  एक गमले  पर  नज़र  जाती  हैं  तो  देखता  हूँ  कि  एक  सुन्दर  सा  पपिते  का  पौधा  उग  आया  हैं  और  जैसे मुझे  मुंह  चिड़ा  कर  कह  रहा  हैं कि  अब  उखाड़  कर दिखाओ मुझे ...
(घर , आगंन  में  पुन : अबाद  होते  Daddy....).

Wednesday, April 28, 2021

चाहे आप कि लेखनी कमज़ोर हो ....
चाहे आप पेशे से लेखक हो चाहे न हो,
पर  जीवन के कुछ संस्मरण ,आप कि साँसो से जुड़े कुछ खास लोगो कि यांदे आप को कुछ लिखने पर  मज़बूर कर ही  देतीं है ,मेरे जीवन   में  एक जो बहुत अहम हस्ती रही है वोह मेरी स्वर्गवासी नानी .....
नानी से मेरा कोई नाल क़ा रिश्ता  नहीं था  हो भी नहीं  सकता था ,पर चुकी मेरे जनम के समय मेंरी मम्मी कि तबियत बहुत ख़राब हो गई थी ,तब शायद उन्होने ही मुझे अपनी छाती से लग कर मेरी भूख को मिटाने का असफल प्रयास किया था। 
उनका चेहरा याद करता हूँ तो गोऱा चिट्टा ,झुरियो से भर चेहरा ही याद आता है ,अब उस मेँ चमक असली घी में  बने ख़ाने  से आई थी या  अफगान स्नो (एक तरह का सौंदर्य प्रसाधन) का कमाल था , जिसे हर  शाम खाट पर बैठ कर नाना  के आने से पहले खूब मल मल कर गालोँ पर लगातीं थीं , पर जो भी हो, थी खूबसूरत। 
छोटा दरमियान कद ,पतला दुबला शरीर पर बला की  चुस्ती और  फुर्ती ......
उनकी एक और खासियत थी धीरे काम करने वाले ओर काले रंग के लोग उनको जरा भी पसन्द नही थे। 
मैं और मेरी बड़ी बहन शरीर और कद काठी से अच्छे खाते पीते घर के लगते है ,जब हम १२ वर्ष के थे तब ही २२ वर्ष के लगते थे ,इस पर जब वोह हमे कहीँ  घुमाने ले कर जाती थीं तब रिक्शवाले के पूछने पर कि कितनी सवारी है, बड़ी अकड़ के साथ बोलती थी....दिखता नहीं है क्या मरे ,एक सवारी दो बच्चे , अब रिक्शावाला हैरान कि सवारी किस को गिने ओर बच्चो में   किस को शमिल करे। 
हमेशा सूती कलफ लगी  साड़ी पहनती थी , कपडे धोने का ऎसा  शौक था कि अपने मुँहलगे प्यारे धोबी (प्यारे धोबी का नाम था ) को भी पीछे छोड़ दे.… 
जीवन के आखिरी वर्षो मे उनके हाथों मे  पडी झुर्रियों को समेट कर मैं  उन से पुछता कि नानी यह झुर्रिया कैसे पड़ गईं ओर वोह हमेशा हंस  कर  कहतीं कि अब यह तो चिता में  जा क़र हीं  मिटेंगी। 
जीवन के अन्तिम दिन उनके लिये ओर हमारे लिये बहुत ही कष्टकारी रहे , पता नहीं ऊपर वाले कि लीला जो जीवन भर इतना चुस्त दुरुस्त रहा वोह  जीवन  के अन्तिम पलों में  इतना अपंग कैसे हो गया .... 
खैर २४ सितम्बर २००२ को मुरादाबाद से लखनऊ तक की यात्रा  १२ घंटो में एम्बुलेंस में  करने  के बाद वोह हमारे घर आईं ,मम्मी जो कि उनकी एकलौती सँतान है ,एक नज़र देखा , और प्रान  त्याग दिये। 
उनको अंत्येष्टि पर ले जाते समय मेरे नाना जो कि करीब 88 -89 वर्ष के होंगे एकदम शान्त थे। 
नानी को चिता पर लिटाने के बाद पंडित ने उनका मूंह उघाड़ा ओर नाना  से बोला  कि लो बाबू जी आखीरी बार देख लो , नाना ने कांपते हाथो से  उनका ठंडा पड़ चुका चेहरा हाथो में लिया ओर लडखडाती जबान से बोले.....
अच्छा भाई ,जा रही हों.....
हिन्दू विधि विधान से उनके सारे अन्तिम संस्कार सम्पन्न किये गये , पर पता नहीं  क्यों उनकी मृत्यु के काफी दिनो बाद तक मुझे यह भ्रम होता  रहा  कि वोह मेरे कमरे के दरवाजे पर खड़ी आवाज़ दे रही है....पंकज  ऐ पंकज ....

(शायद मैं यह नहीं लिख पाता अगर खुशवंत सिंह द्वारा लिखी गई "दादी माँ" न पढता)

Tuesday, April 27, 2021

सिर्फ  एक कॉल ....
अवसाद और  भय  का  माहौल  हैं ,
अफरा  तफरी और  ज़िन्दगी  जी  लेने  की जाद्दो  जहद चल रहीं हैं ,
अंजाना  डर  हमारे  दिल  और  दिमाग  पर  छाया  हुआ  हैं ,
विपरित  परिस्थितियों  में  हमें  क्या  करना  होगा  क्या  नहीं , इसी  में  दिमाग  ऊलझा  हुआ  हैं ,
हम खुद से ज्यादा  अपने  परिवार  के लिए आशंकित  हैं  खास  तौर  से अगर  कोई बुजुर्ग आपके  घर पर  हैं ....
दिमाग  इसी  माथापच्ची  में  थक  कर चूर  हो चुका  हैं ,
आप  अवसाद  में  घिरे  बिस्तर  पर  हैं , आधी  रात  हो चुकी  हैं , नींद  का  एक कतरा  भी आँखों  में  नहीं  हैं ....
आप  यूँ  ही कुछ  लिख कर अपने  मित्रों  के  एक WhatsApp Group में  डाल  देते हैं ....
और  यकायक  आपके  फ़ोन  की घंटी  घन घना  कर  बजती हैं ...
आप  एक ऐसा  नाम  देखते  हैं  ज़िसकी  आपको  उम्मीद  नहीं  होती ,
call करने वाला  बेहद  प्यार और  भरोसे के  साथ  आपको  अपने  होने  का  एहसास  कराता हैं  और  आशवस्त  करता  हैं कि  वोह आपके साथ हैं ....
बस  इसी  विश्वास  के दो  मीठे  बोल किसी औषिधी का  सा  काम  करते  हैं  और  आप  चैन  की नींद  सो  जाते  हैं ....
इस  वक़्त  दुरियां  खत्म  करें ,
मित्रों  के  करीब  आये ,
घर  ना  जा  कर  केवल  फ़ोन  पर  ही अपने  होने  का  एहसास  करायें ,
इस  मुशकिल  वक़्त  में  यहीं  सब  से बड़ी  Oxygen होगी  उनके  लिए ...
(व्यक्तिगत  अनुभव )

Friday, April 23, 2021

सन  1977 में  एक छोटे  से जनपद  मुरादाबाद  से इस  महानगरी  लखनऊ में  आना  हुआ  था ,
9-10 साल  की उम्र  में यह शहर  की चहल पहल  मेरे  लिए  अद्भूत  और  रोमांचकारी  थी ,
माँ  का  आँचल  पकड़े  पकड़े  अमीनाबाद  की सड़को  पर  चलना  और  कहीं  खो  ना  जाऊ  इस  डर  से खुद  को बचाना  अपने  आप  में  एक बड़ा  काम  हुआ  करता  था ,
खैर  उस  वक़्त  जो चीज  मुझे सब  से ज्यादा चौकाती  थी  वोह  थी  अमीनाबाद  की सड़को  पर  बिकता  हुआ पीने  वाला  पानी ,
जो शायद  तब  5 य़ा 10 पैसे का  हुआ  करता था ,
साफ  सुथरे  ठेले , चमचमाते शीशे  के ग्लास और  उनसे छलकता  पानी ,
बार  बार  सोचने  पर  भी यह  नहीं समझ  पाता  कि  आखिर  इस  शहर  में  पानी  क्यूँ  बिकता  हैं ,
बाल  मन  का  कौतुहूल शांत  करने  के  लिए  कई  बार  माँ  से आग्रह  कर  के  पानी  ख़रीद  कर  पिया  चाहे  प्यास  थी  चाहे  नहीं ....
कुछ भी खास  नहीं  लगा ....
शायद  घर  का पानी  ही ज्यादा  मीठा  होता  हैं , ऐसा  कुछ दिल और  दिमाग  दोनों  बोल  पड़े ....
खैर  धीरे  धीरे  इस  शहर  ने मुझे और  मैनें  इस  शहर  को अपना  लिया ....
लखनऊ ने मुझे बहुत कुछ दिया ,
नाम , पहचान , इज्ज़त , दोस्त  और भी ना  जाने  क्या  क्या ....
परंतु  जो कभी जीवन  में  नहीं सोचा  था  आज  वोह स्वयं  आँखो  के आगे  होता  देख लिया ....
लखनऊ  में  आज  पानी  के साथ  ही साथ  साँसे  भी कालाबजारी  के साथ  बाजार  का  एक हिस्सा  बन  गई ....
दुखद  परंतु  सत्य ....

Monday, April 19, 2021

अभी किसी  मित्र  ने  यूँ  ही एक तस्वीर  भेज  दी , जहाँ  पूरा  परिवार  एक साथ  एक  ही  पलंग  पर  बैठा  हैं ....
शायद  हम  वहीं  कुछ बनाते  हैं जो  कुछ  हम  स्वयं  अनुभव  करते  हैं ,
बरसों  पहले  हम  भाई बहन  , माता  पिता  के साथ  यूँ  ही एक पलंग पर  ना  जाने  कितने  ही किस्से  कहानियां बुना  करते  थे ....
जाड़े  की सर्द  रातें  , सूती  छापेदार  लिहाफ , हम  पांच  और  मम्मी  का  जादूई स्टील  का  डिब्बा , मेवे  से भरा  हुआ ....
कब  खत्म  हो  जाता  था , पता  ही नहीं  चलता  था ,
कभी कभी यूँ  ही बिस्तर  में  घूसे  घूसे  सो जाता  था  और  मम्मी  गर्म गर्म  खाना  सोते  सोते  ही खिला  देती  थी पर  सोते  सोते  भी जीभ  पर  सारे  स्वाद  रहते  थे  कि  अगला  कौर  काहे  से खाना  हैं ....
Daddy का  tour से वापिस  आना  और  य़ात्रा  का  लेखा  जोखा  खुलना  भी बिस्तर  पर  ही हुआ  करता  था ,
खैर  किस्से  तो बहुत  हैं ,
पलंग  भी  हैं ...
बस  अब  Daddy नहीं  हैं ....

Thursday, April 15, 2021

दिल और  दिमाग  को  कड़वा  करती  पोस्ट ,
भड़काऊ videos , Statements , तस्वीरें और  भी  ना  जाने  क्या  क्या ...
मन  एकदम  खट्टा हो चुका  था ....
एक खास  संप्रादाये  का  हर  व्यक्ति  शक  के  घेरे  में  खड़ा  था ...
तभी  घनघना  कर  फ़ोन  बज  उठा ...
बात  करने  वाला  व्यक्ति  अभिन्न  मित्र  और  एक  बेहद  नेक  दिल डॉक्टर  हैं ...
अवाज  में  चिंता  हैं ...
दिल  आशंकित  हो  उठता  हैं  कि  सब  ठीक  ठाक  तो हैं ...
पता  चलता  हैं  कि  कोटा (राजस्थान ) में  उसके  बड़े  भाई  के  3 बच्चे  गत  1 महीने  से फसें  हुए  हैं ....
राशन , गैस  सब  खत्म  हो चुका  हैं ,
बाजार  य़ा  तो बंद  हैं  य़ा  वहां  से बिकने  वाला  समान  उनकी  जेब  की शक्ति  से बहुत  ऊपर  हैं ...
उनकी  मदद  करनी  हैं  पर  कैसे  करें ,
यह चिंता  का  विषय  हैं ... 
अंजान  शहर 
अंजान  लोग ....
उम्मीद  नहीं  थी  पर  फिर भी यूँ  ही  फेसबुक प़र  मदद  की  गुहार  लगा  दी ....
5 मिनट  भी  नहीं  गुजरे  होंगे  कि  एक  परीचित  का  फ़ोन  आ  गया  और  उन्होने  अपने  एक  कोटा  में  रहने  वाले  मित्र  से परिचय  करा  दिया ...
आनन  फानन  नंबर  , पता  दिया  गया  और  रात और  गहराती  इसके  पहले  ही  बच्चों  के  पास  मदद  पहुचं  गई ....
दिल  गद गद  हो  गया ...
मस्तक  श्रद्धा  से झुक  गया ...
दिल  से ढेरों  दुयायें  निकल  गई ...
मदद  करने  वाले  व्यक्ति  का  नाम  था  
मौलाना नफीस  बेग .....

Wednesday, April 7, 2021

Moradabadi Daal

मुरादाबादी  दाल ,
आजकल  बहुत  प्रसिद्ध  हो रहीं  हैं ,
सुना  हैं  कि  कई  पांच  सितारा  होटेल  के  दामी  menu card में  भी अपना  नाम  दर्ज करा चुकी हैं ,
खैर  मेरी  और  इस  चटपटी  दाल  की दोस्ती  तकरीबां 45 saal पुरानी  तो होगी  ही ....
चूकें  ननिहाल  खास  मुरादाबाद  का  था  तो इसका  स्वाद  तो बचपन  में  ही चखा दिया  गया  था ,
सुबह  सवेरे  नानी  नाना  को झक सफेद  कुरते  पजामे  में  सजा  कर  बांस  की नाव  अकार  टोकरी  थमा  कर भेज देती  हैं  किसी  गली  के  नुक्कड पर , चटपटी  मूंग  की दाल  लाने , पीतल  के  बड़े  बड़े  देगों में  सुलगती  और  धीरे  धीरे  पकती  दाल  अद्भूत  स्वाद  आपकी  जुबां  पर  रचा  बसा  देती  हैं ....
सीधे  साधे  मसालों  में पकी  दाल , हींग  जीरे  से  छुकी  और  नींबू  के  रस  से लगी  लिपटी , अहा , आज  भी जबान  पर  अपना  हक़  ज्यो  का  त्यों जमाये  हुए  हैं ....
लाख  कोशिश  करने पर भी  मुरादाबादी  दाल  का  वोह  स्वाद अवध  में  ज़िन्दा  नहीं  कर पाया शायद  यह  वहां  के पानी का  नमक हैं  जो  अवध  को अपने  नुक्कड   वाली  दाल  का  स्वाद  नहीं दे  पाया ....

Monday, March 22, 2021

20.03.2020

22.03.2020,
नहीं  जानता  कि  जो  कुछ  किया  उसका  क्या  अर्थ  था ,
व्यर्थ  में  एक  भेड़  चाल  का  हिस्सा  बना  या  कोई  अर्थपूर्ण  कार्य  किया ,
पिता  जी  एक ऊँचे  दर्जे के  चिकित्सक  थे ,
10.02.2020 को  ही  गोकुलाधाम  को  प्रस्थान  कर गये थे ,
गोकुलाधाम  इसलिये  लिखा  क्यूंकी  वोह  मथुरा निवासी थे  हालाकि  आजीवन  उनकी  आस्था  महावीर बजरंग बली  में  ही रहीं ,
खैर  घोषण  के  अनुसार  मैनें  अपना  मन  बना  लिया  था  कि  मैं  भी थाली  पीट  पीट  कर  अपने  पिता  जी  को याद करूँगा और  हर  उस  चिकित्सक  का  सम्मान  करूँगा जो  कि  Corona से बचाव  के लिए हम  सब  की  सेवा  में  अग्रसर  हैं ,
दुखद  था  माँ  को देखना , जो केवल मेरे  कारण  बाहर  आयी  और  इस  कार्य  का  एक हिस्सा  बनी ,
आँखो  में  आंसू  लिए , सूनी  सूनी  आँखों  से थाली  बजाती  रहीं  और  उनके  लिए  फीके  पड़  गये  नीले  अकाश  में  Daddy को  खोजती  रहीं .....

Monday, March 15, 2021

नानी का आँचल

नानी  का  आँचल ,
बिना  किसी  कस्तुरी के  महकता हुआ  सा  वोह सूती  साड़ी  का  आँचल ,
प्यार , दुलार  और  माँ  के  पास  होने  का  एहसास  कराता  हुआ  वोह  मेरी  नानी  का  आँचल ,
कितने  ही वर्ष  बीत  गये ,
ना  आज  नानी  हैं  ना  ही उनका  वोह सूती  साड़ी  वाला , कलफ से अकड़ा  हुआ  पर  हमारे  लिए  रेशम से भी मुलायाम और  महकता आँचल .... 
पर  उसकी  खुशबू  आज  भी  दिल और  दिमाग  में  ज्यों  की  त्यों  हैं ....
उनके  आने  पर  उनसे  चिपट  कर  जो शांति  और  प्रेम  का  एहसास  होता  था  वोह आज  का  दामी  meditation या  योगा  भी नहीं  दिला  सकता  इस  बात  का  पक्का यकीन  हैं  मुझे .....
खैर  जीवन  के आखिरी  सालों  में  वोह बेचारी  साड़ी  तो कभी पहन नहीं पाई और  जीवन  के आखिरी  पल  यूँ  ही बिस्तर  में  काट  दिये .....
अपनी  नाश्वार  देह त्यागने  के उपरांत  एक बार  फिर से उनको उनकी  प्रिये  सूती  साड़ी  में  लपेटा  गया ,
माथे  पर  साजाई गई  बड़ी  सी  लाल  बिन्दी , मांग  में  सिन्दूर  भर  कर  शिंगार  पूरा  किया  गया ,
सर  पर  कोरे  आँचल  का  पल्ला  रखा  गया , और  नाना  को बोला  गया  कि  आखिरी  बार  देख  लो ,
कांपते  हाथों  से उनका  शांत  पड़  गया  चेहरा  हाथों  में  लिया  और  रूँधे  हुए  गले  से बस  यह  बोल  पाये,
अच्छा  भाई , जा  रहीं  हो .....

Saturday, March 6, 2021

BODMAS

बात हैं  शायद  1975 की ,
कक्षा  6 के हम विद्यार्थी  थे , मुरादाबाद  के  एक जाने  माने स्कूल  के ,
बड़े  बड़े  कमरे ,
किसी  बड़ी  पुरानी  हवेली सा  स्कूल , आगे  पीछे  बड़े  बड़े  मैदान  ज़िनसे  मेरा  कोई खास  वास्ता  नहीं  क्यूंकी  खेल  कूद  में  कभी  कोई रूची  ही नहीं  थी , zero period ज्यादातर पेट  दर्द  के  बहाने  के  साथ  क्लास  में  बैठे  बैठे  ही  खत्म  हो  जाता  था ,
खैर  असली  मुद्दे  पर  आते  हैं , पढ़ाई  लिखाई  में  कभी भी अववल  दर्जे के  तो हम रहे  नहीं , उस  पर  गणित  और  Science तो यमराज से भी भयानक  थे ,
परीक्षा  की घड़ी  सर  पर  थी ,
और  दिमाग  एकदम  सफा  चट्ट  था , पर्चा  गणित  का  जो  था ,
और  पाठ  था  BODMAS का ....
अब यह BODMAS मुझे  किसी  बोड़ाम  बिहारी  जैसा  लग  रहा  था , खैर  पढ़ाने  का  ज़िम्मा  पिता  जी को  सौपा  गया ,
उन्होने  भी नहीं  सोचा  होगा  कि  उनका  खुद  का  खून  बनिया  होते  हुए  भी  गणित  में  इतना  गुड़  गोबर होगा ,
पूरी  मेहनत  और  अथक  प्रयासों  से मुझे  समझाने  का  भगीरथी  प्रयास किया  गया ....
कई घंटो की  मेहनत  के  बाद  हम  एक विजयी  मुस्कान  के  साथ  पिता जी  की कैद  से आजाद  हुए  उनको  आशवस्त  करते  हुए  कि  कल  विजय  ध्वज  हम  ही लहरायेंगे ,
घोडे  बेच  कर  सोने  के  बाद  सुबह  हुई  और  हम दही  बताशा  खा  कर  पहुँच  गये  Examination Hall में ,
Confidence गजब का  था ,
अकड  के मारे  गर्दन  में  दर्द  होने  लगा  था ,
समयानुसार  पर्चा  मिला ,
चूकें  सब  आता  हैं  यह हम  मान  चुके  थे  और  नियत  वक़्त  के  बहुत पहले  ही  सारे  सवालो  के  जवाब  दे  कर , हम  घर  वापिस  आ  गये ,
पूरे  घर  में  अपनी  होशियारी  के  चर्चे आम  कर  दिये ,
खैर  कुछ दिनों  की  बादशाहत  एक दिन तो खत्म  होनी  ही  थी ,
नतीजा  निकला और  हमें  नतिजे  में  मिला  शतुर्मुर्ग के अंडे  से भी बड़ा  अंडा ,
हमारा  घमंड फर्श  पर  गिर  कर आखिरी  साँसे  लें  रहा था ,
और  पिता  जी  के आने  से पहले  छुपने  का  स्थान  सोचता  मैं  बिचारा  सोच  रहा था कि  बात  confidence तक  ही रहती  तो ठीक  रहता , बस  यह  Over कुछ ज्यादा  ही Over हो गया ....