Friday, August 14, 2020

 स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर १ विचार मन में आया है..

कितने वर्ष बीत गए स्वाधीन हुए...हम में से कितने होंगे जिनको यह पता भी नहीं होगा की देश को स्वाधीन हुए कितना लम्बा अरसा हो गया..कुछ लोगो के लिए 

स्वाधीनता का अर्थ केवल facebook पर तिरंगे की फोटो लगाना..और स्कूल से आये बच्चो द्वारा लाये गए लड्डू का सेवन करना ही है..

बापू ने हम सब को अहिंसा का सन्देश दिया...परन्तु आज हम उसी  सन्देश की पूरी तरह से अवहेलना करते नज़र आ रहे है..

आज भी इस देश में फांसी जैसी सजा का प्रावधान है..

क्या यह अपराध नहीं है..अभियुक्त ने अपराध किया..उस ने मासूमो की जान ली..पर हमने और हमारी कानून  व्यवस्था ने तो उस से भी जघन्य अपराध कर डाला..उस अभियुक्त को फासी दे कर...

क्या उस अभियुक्त की मानसिकता को बदलने  का प्रयास करना १ सुंदर प्रयास नहीं होता इस सुसंसकृत सभ्य समाज का...कहा जाता है की आदमी के पापो से घृणा करो पापी से नहीं...परन्तु यहाँ तो हमने पाप को पापी के संग ही ख़तम कर डाला..

मुझे लगता है की जेल में सजा काट रहे सजायाफ्ता लोगो को योग और अन्य सामाजिक संस्थाओ के माध्यम से सुधरने और १ सभ्य नागरिक बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए..

जब सजायाफ्ता अपराधी सजा काट कर बाहर आये तो अपनी परिवेर्तित मानसिकता से समाज के लिए १ सुंदर उद्धरण प्रस्तुत करे...ऐसा सोचना ही अपने आप में कितना सुखद अनुभव है...

Sunday, August 9, 2020

 अतीत  में  जाना  कोई मुशकिल  काम  नहीं  हैं ,

बस  यादों  का  दरवाजा खोलिये ,

चरमाराता  हुआ  दरवाजा , आवाजें  निकालता  हुआ  आपको  वहां  लें  जायेगा  जहाँ  एक सीले  हुए  से कमरे  में  वोह  सब  यादें  और  आपके  अपने  मिल  जायेंगे  जो  वक़्त की  धूल  में  कहीं  दब  गये  हैं...

मैं अगर  याद  करूँ  तो  मुझे  याद  आता  हैं  मेरी  नानी के घर  का  वोह  पुराना  काला  पड़  चुका  लकड़ी  का  दरवाजा जो  काफी  जोर  लगाने  के बाद  खुलता  था  और  लोहे  की  कुंडी , अपना  अलग  ही  सरगम सुनाती  थी ....

सीला  सा  कमरा ,

नानी  की खाट ,

नाना  का  तख्त ,

ढेरों  आयुर्वेदिक  दवाओं  की अजीब  सी  खुशबू ...

पुराना  लटकता  हुआ  पीला  पड़  चुका  पंखा ....

कमरा  पार  कर के  आगन  में  पहुंचते  ही  नानी  की रसोई  दिखाई  देती थी ,

रसोई  में  उनका  स्टोव  और  उनके  पीले  रंग  वाला  Plastic का  मसालदान आज  भी याद  हैं ....

सब  कुछ नाना  का  होते  हुए  भी घर  नानी  का  क्यूँ  कहाँ  जाता  था , यह आज  तक  समझ  नहीं  आया ....

खैर  नानी  ने कभी कुछ ऐसा  बनाया  या  खिलाया  हो  जो याद  रह  जाये  , यह तो याद नहीं , हाँ  उनका  बनाया  हर  खाना  होता  बहुत स्वाद था ....

लाड़  और  दुलार  का  छोंक , देशी  के साथ ...

शायद  यहीं राज़  था  उनकी  रसोई  का ...

नाना  का  वोह  सुबह  सुबह  मुरादाबादी  दाल , बांस  की  टोकरी  में  लाना , गर्म  गर्म  जलेबी  के साथ ....

जो दाल हम  बचपन  से खाते  चले  आ  रहें  हैं  आज  वोह International Level पर  अपनी  जगह  बना  चुकी  हैं ,ऐसा  होगा  यह कभी भी नहीं सोचा  था ....

हाँ , बातों  बातों  में  भूल  ना जाऊँ , बताता  चलूं , नानी  की  सूती  साड़ी  में  से आने  वाली  वोह खुशबू आज भी याद  हैं .....

हाथ  की झूर्रियों  को जब  मैं  समेट  कर पूछता  कि यह कैसे  पड़  गई , तो  हसंते  हुए  बोलती  कि  अब  तो यह चिता  में जा  कर ही मिटेगी ....

वैसी  ही झूरियां  अब माँ  के  हाथ में  देखता  हूँ  पर  कुछ  कहने  या  पूछने  की हिम्मत  नहीं कर पाता .....

धीरे  धीरे  जिन  रिश्तों  के साथ  हम  पैदा  हुए  थे ,

सब  खत्म  होते  जा  रहे  हैं ,

नये  रिश्तो में  अभी वो  गर्माहाट नहीं  हैं , स्थिती  कुछ कुछ त्रिशांकु सी  हैं ....

उम्मीद  हैं  एक  दिन नये  रिश्ते  महकेंगे और  हमको  यादों  की  इन  विचित्र  गलियों  से नहीं  गुजारना पड़ेगा ....