Wednesday, December 15, 2021

Old time Memories

एक  मित्र द्वारा लिखित 1 लेख पढने का सौभाग्य मिला...
बिलकुल सही लिखा है ...जीवन की आपा धापी मैं हम यह छोटे छोटे सुखों को भूलते जा रहे है...
मुझे आज जीवन के 55 वर्ष पूरे  करने के बाद भी वोह सुखद अनुभूती याद है ...जब जिला फरुक्खाबाद मैं मेरे पिता जी 1 सरकारी पद पर  आसीन थे ..और हम सब उस छोटे से मगर बेहद खुबसूरत शहर मैं बने हुए 1 फट्टा टाकीज़ में  जाया करते थे.....चूकें मेरे पिता जी 1 ऊँचे सरकारी पद पर  आसीन थे...अतः हम लोगो को कभी भी धुल के गुबार के बीच टिकेट खरदीने का सौभाग्य नहीं मिला ....यह काम हमेशा हमारे प्रिय काका जिनका नाम शायद इल्याज़ था किया करते थे ...फिर आती थी वोह शाम जिस का हम सब मैं और मेरी बहन व भाई इंतज़ार किया करते थे ...शाम होते होते हमारे सारे  मित्रो को पता चल जाता था कि हम सब सलीमा देखने जा रहे है ...बड़ी सी गाड़ी को साफ़ सुथरा कर के निकाला जाता था ...हम सब अपने खुबसूरत लिबासो में ऐसे सज जाते थे जैसे किसी विवाह समारोह में  जा रहे हो ...
भीड़ में जा कर  गाड़ी का रुकना ...लोगो का कौतुहल पूर्वक हम सब को देखना ...और 1 ख़ास होने का अहसास लिए हुए हम सब का उस फट्टा टाकीज में दाखिल होना ....
फिर शुरू होती थी घिर घिर की आवाज़ के साथ पीले पड़  चुके परदे पर रंग बिरंगी आक्रतियो का रंगा  रंग कार्यक्रम ....गर्मी हो तो बहता पसीना...बारिश होती हो..तो टिप टिप करती बूँदे ...और जाड़ा  हो तो तेज़ गति से आती सर्द हवाए टाट के उस परदे को बेपर्दा कर के हम  सब को सड़क पर  होने वाले तमाशो से भी अवगत कराती चलती .... 
इसी बीच अगर कोई गाना आ जाये तो पूछिए मत ....इतने स्वर और सीटी  baj जाती कि कानो को कई बार बंद करना पड़  जाता था ...
फिर बीच बीच मैं मम्मी के द्वारा बनाये गए आलू के परोठो के संग आम का अचार ...1000रुपया खर्च कर  के खरीदे गए pop corns...nacho...etc..मुंह में वोह स्वाद नहीं घोल सकते .
फिर अंत होते होते नींद अपने पूरे जोरो पर  आने लगती थी....कई बार तो मम्मी की गोदी ही तकिया बन जाती थी ...और बहन की गोदी पैताना ....
फिर कब डैडी उठा गोदी मैं उठा कर घर ले आते .....याद भी नहीं रहता...याद रहता तो मानस पटल पर  अंकित वही रंग बिरंगे रंग...तेज़ आवाज़ से गूंजता संगीत....जो आने वाले अगले कई रातो के सुंदर सपनो का पसंदीदा विषय रहता.....

Saturday, December 4, 2021

आस पास देखता हूँ  तो हम सब 50+ की अवस्था  वाले  एक जैसी ही मानसिक  अवस्था  में नज़र  आते  हैं ,
सालों  पहले  जो तिनका  तिनका  जोड़  कर  एक आशियाना  बनाया  था  आज वोह धीरे  धीरे  बिखरता नज़र  आ रहा  हैं , उम्र  के साथ  स्वास्थ  अब कुछ ज्यादा ठीक  नहीं  रहता , सब  कुछ ही digital होता  जा  रहा  हैं , अब बूड़ा  तोता  कितना  राम  राम  बोलना  सिखेगा ,अभी  तो बच्चें  हैं  तो बहुत  कुछ काम  कर  देते  हैं , बच्चें  अपने  पंख  पसार  रहें  हैं , उनकी  अपनी  नई  मांजिले  हैं , ऊँची  उड़ान  हैं ....
पैसों  और  भविष्य  की चकाचौंध हैं ,
लखनऊ  उनके सपनों  का  शहर  नहीं  हैं ....
और  एक हम लोग हैं  जो लखनऊ से अपने  को अलग देख ही नहीं सकते ,
बच्चों  की तरक्की के रास्ते  में  रोड़ा  बनना  हमारा  निजी  स्वार्थ  होगा ,
वोह बाहर  जायेंगे  ही  और  जाना  भी चाहिए ....
फिर क्या  किया  जायें ,
समाधान  सरल  हैं ,
अपने  अपने  घर  और  दिल  के दरवाजे खोलिये , आस पास  के लोगों  से हाथ  नहीं दिल  मिलायें ,
और  फिर से एक कभी ना  बिखरने  वाला अपना  घर  बनायें ....