Wednesday, April 28, 2021

चाहे आप कि लेखनी कमज़ोर हो ....
चाहे आप पेशे से लेखक हो चाहे न हो,
पर  जीवन के कुछ संस्मरण ,आप कि साँसो से जुड़े कुछ खास लोगो कि यांदे आप को कुछ लिखने पर  मज़बूर कर ही  देतीं है ,मेरे जीवन   में  एक जो बहुत अहम हस्ती रही है वोह मेरी स्वर्गवासी नानी .....
नानी से मेरा कोई नाल क़ा रिश्ता  नहीं था  हो भी नहीं  सकता था ,पर चुकी मेरे जनम के समय मेंरी मम्मी कि तबियत बहुत ख़राब हो गई थी ,तब शायद उन्होने ही मुझे अपनी छाती से लग कर मेरी भूख को मिटाने का असफल प्रयास किया था। 
उनका चेहरा याद करता हूँ तो गोऱा चिट्टा ,झुरियो से भर चेहरा ही याद आता है ,अब उस मेँ चमक असली घी में  बने ख़ाने  से आई थी या  अफगान स्नो (एक तरह का सौंदर्य प्रसाधन) का कमाल था , जिसे हर  शाम खाट पर बैठ कर नाना  के आने से पहले खूब मल मल कर गालोँ पर लगातीं थीं , पर जो भी हो, थी खूबसूरत। 
छोटा दरमियान कद ,पतला दुबला शरीर पर बला की  चुस्ती और  फुर्ती ......
उनकी एक और खासियत थी धीरे काम करने वाले ओर काले रंग के लोग उनको जरा भी पसन्द नही थे। 
मैं और मेरी बड़ी बहन शरीर और कद काठी से अच्छे खाते पीते घर के लगते है ,जब हम १२ वर्ष के थे तब ही २२ वर्ष के लगते थे ,इस पर जब वोह हमे कहीँ  घुमाने ले कर जाती थीं तब रिक्शवाले के पूछने पर कि कितनी सवारी है, बड़ी अकड़ के साथ बोलती थी....दिखता नहीं है क्या मरे ,एक सवारी दो बच्चे , अब रिक्शावाला हैरान कि सवारी किस को गिने ओर बच्चो में   किस को शमिल करे। 
हमेशा सूती कलफ लगी  साड़ी पहनती थी , कपडे धोने का ऎसा  शौक था कि अपने मुँहलगे प्यारे धोबी (प्यारे धोबी का नाम था ) को भी पीछे छोड़ दे.… 
जीवन के आखिरी वर्षो मे उनके हाथों मे  पडी झुर्रियों को समेट कर मैं  उन से पुछता कि नानी यह झुर्रिया कैसे पड़ गईं ओर वोह हमेशा हंस  कर  कहतीं कि अब यह तो चिता में  जा क़र हीं  मिटेंगी। 
जीवन के अन्तिम दिन उनके लिये ओर हमारे लिये बहुत ही कष्टकारी रहे , पता नहीं ऊपर वाले कि लीला जो जीवन भर इतना चुस्त दुरुस्त रहा वोह  जीवन  के अन्तिम पलों में  इतना अपंग कैसे हो गया .... 
खैर २४ सितम्बर २००२ को मुरादाबाद से लखनऊ तक की यात्रा  १२ घंटो में एम्बुलेंस में  करने  के बाद वोह हमारे घर आईं ,मम्मी जो कि उनकी एकलौती सँतान है ,एक नज़र देखा , और प्रान  त्याग दिये। 
उनको अंत्येष्टि पर ले जाते समय मेरे नाना जो कि करीब 88 -89 वर्ष के होंगे एकदम शान्त थे। 
नानी को चिता पर लिटाने के बाद पंडित ने उनका मूंह उघाड़ा ओर नाना  से बोला  कि लो बाबू जी आखीरी बार देख लो , नाना ने कांपते हाथो से  उनका ठंडा पड़ चुका चेहरा हाथो में लिया ओर लडखडाती जबान से बोले.....
अच्छा भाई ,जा रही हों.....
हिन्दू विधि विधान से उनके सारे अन्तिम संस्कार सम्पन्न किये गये , पर पता नहीं  क्यों उनकी मृत्यु के काफी दिनो बाद तक मुझे यह भ्रम होता  रहा  कि वोह मेरे कमरे के दरवाजे पर खड़ी आवाज़ दे रही है....पंकज  ऐ पंकज ....

(शायद मैं यह नहीं लिख पाता अगर खुशवंत सिंह द्वारा लिखी गई "दादी माँ" न पढता)

Tuesday, April 27, 2021

सिर्फ  एक कॉल ....
अवसाद और  भय  का  माहौल  हैं ,
अफरा  तफरी और  ज़िन्दगी  जी  लेने  की जाद्दो  जहद चल रहीं हैं ,
अंजाना  डर  हमारे  दिल  और  दिमाग  पर  छाया  हुआ  हैं ,
विपरित  परिस्थितियों  में  हमें  क्या  करना  होगा  क्या  नहीं , इसी  में  दिमाग  ऊलझा  हुआ  हैं ,
हम खुद से ज्यादा  अपने  परिवार  के लिए आशंकित  हैं  खास  तौर  से अगर  कोई बुजुर्ग आपके  घर पर  हैं ....
दिमाग  इसी  माथापच्ची  में  थक  कर चूर  हो चुका  हैं ,
आप  अवसाद  में  घिरे  बिस्तर  पर  हैं , आधी  रात  हो चुकी  हैं , नींद  का  एक कतरा  भी आँखों  में  नहीं  हैं ....
आप  यूँ  ही कुछ  लिख कर अपने  मित्रों  के  एक WhatsApp Group में  डाल  देते हैं ....
और  यकायक  आपके  फ़ोन  की घंटी  घन घना  कर  बजती हैं ...
आप  एक ऐसा  नाम  देखते  हैं  ज़िसकी  आपको  उम्मीद  नहीं  होती ,
call करने वाला  बेहद  प्यार और  भरोसे के  साथ  आपको  अपने  होने  का  एहसास  कराता हैं  और  आशवस्त  करता  हैं कि  वोह आपके साथ हैं ....
बस  इसी  विश्वास  के दो  मीठे  बोल किसी औषिधी का  सा  काम  करते  हैं  और  आप  चैन  की नींद  सो  जाते  हैं ....
इस  वक़्त  दुरियां  खत्म  करें ,
मित्रों  के  करीब  आये ,
घर  ना  जा  कर  केवल  फ़ोन  पर  ही अपने  होने  का  एहसास  करायें ,
इस  मुशकिल  वक़्त  में  यहीं  सब  से बड़ी  Oxygen होगी  उनके  लिए ...
(व्यक्तिगत  अनुभव )

Friday, April 23, 2021

सन  1977 में  एक छोटे  से जनपद  मुरादाबाद  से इस  महानगरी  लखनऊ में  आना  हुआ  था ,
9-10 साल  की उम्र  में यह शहर  की चहल पहल  मेरे  लिए  अद्भूत  और  रोमांचकारी  थी ,
माँ  का  आँचल  पकड़े  पकड़े  अमीनाबाद  की सड़को  पर  चलना  और  कहीं  खो  ना  जाऊ  इस  डर  से खुद  को बचाना  अपने  आप  में  एक बड़ा  काम  हुआ  करता  था ,
खैर  उस  वक़्त  जो चीज  मुझे सब  से ज्यादा चौकाती  थी  वोह  थी  अमीनाबाद  की सड़को  पर  बिकता  हुआ पीने  वाला  पानी ,
जो शायद  तब  5 य़ा 10 पैसे का  हुआ  करता था ,
साफ  सुथरे  ठेले , चमचमाते शीशे  के ग्लास और  उनसे छलकता  पानी ,
बार  बार  सोचने  पर  भी यह  नहीं समझ  पाता  कि  आखिर  इस  शहर  में  पानी  क्यूँ  बिकता  हैं ,
बाल  मन  का  कौतुहूल शांत  करने  के  लिए  कई  बार  माँ  से आग्रह  कर  के  पानी  ख़रीद  कर  पिया  चाहे  प्यास  थी  चाहे  नहीं ....
कुछ भी खास  नहीं  लगा ....
शायद  घर  का पानी  ही ज्यादा  मीठा  होता  हैं , ऐसा  कुछ दिल और  दिमाग  दोनों  बोल  पड़े ....
खैर  धीरे  धीरे  इस  शहर  ने मुझे और  मैनें  इस  शहर  को अपना  लिया ....
लखनऊ ने मुझे बहुत कुछ दिया ,
नाम , पहचान , इज्ज़त , दोस्त  और भी ना  जाने  क्या  क्या ....
परंतु  जो कभी जीवन  में  नहीं सोचा  था  आज  वोह स्वयं  आँखो  के आगे  होता  देख लिया ....
लखनऊ  में  आज  पानी  के साथ  ही साथ  साँसे  भी कालाबजारी  के साथ  बाजार  का  एक हिस्सा  बन  गई ....
दुखद  परंतु  सत्य ....

Monday, April 19, 2021

अभी किसी  मित्र  ने  यूँ  ही एक तस्वीर  भेज  दी , जहाँ  पूरा  परिवार  एक साथ  एक  ही  पलंग  पर  बैठा  हैं ....
शायद  हम  वहीं  कुछ बनाते  हैं जो  कुछ  हम  स्वयं  अनुभव  करते  हैं ,
बरसों  पहले  हम  भाई बहन  , माता  पिता  के साथ  यूँ  ही एक पलंग पर  ना  जाने  कितने  ही किस्से  कहानियां बुना  करते  थे ....
जाड़े  की सर्द  रातें  , सूती  छापेदार  लिहाफ , हम  पांच  और  मम्मी  का  जादूई स्टील  का  डिब्बा , मेवे  से भरा  हुआ ....
कब  खत्म  हो  जाता  था , पता  ही नहीं  चलता  था ,
कभी कभी यूँ  ही बिस्तर  में  घूसे  घूसे  सो जाता  था  और  मम्मी  गर्म गर्म  खाना  सोते  सोते  ही खिला  देती  थी पर  सोते  सोते  भी जीभ  पर  सारे  स्वाद  रहते  थे  कि  अगला  कौर  काहे  से खाना  हैं ....
Daddy का  tour से वापिस  आना  और  य़ात्रा  का  लेखा  जोखा  खुलना  भी बिस्तर  पर  ही हुआ  करता  था ,
खैर  किस्से  तो बहुत  हैं ,
पलंग  भी  हैं ...
बस  अब  Daddy नहीं  हैं ....

Thursday, April 15, 2021

दिल और  दिमाग  को  कड़वा  करती  पोस्ट ,
भड़काऊ videos , Statements , तस्वीरें और  भी  ना  जाने  क्या  क्या ...
मन  एकदम  खट्टा हो चुका  था ....
एक खास  संप्रादाये  का  हर  व्यक्ति  शक  के  घेरे  में  खड़ा  था ...
तभी  घनघना  कर  फ़ोन  बज  उठा ...
बात  करने  वाला  व्यक्ति  अभिन्न  मित्र  और  एक  बेहद  नेक  दिल डॉक्टर  हैं ...
अवाज  में  चिंता  हैं ...
दिल  आशंकित  हो  उठता  हैं  कि  सब  ठीक  ठाक  तो हैं ...
पता  चलता  हैं  कि  कोटा (राजस्थान ) में  उसके  बड़े  भाई  के  3 बच्चे  गत  1 महीने  से फसें  हुए  हैं ....
राशन , गैस  सब  खत्म  हो चुका  हैं ,
बाजार  य़ा  तो बंद  हैं  य़ा  वहां  से बिकने  वाला  समान  उनकी  जेब  की शक्ति  से बहुत  ऊपर  हैं ...
उनकी  मदद  करनी  हैं  पर  कैसे  करें ,
यह चिंता  का  विषय  हैं ... 
अंजान  शहर 
अंजान  लोग ....
उम्मीद  नहीं  थी  पर  फिर भी यूँ  ही  फेसबुक प़र  मदद  की  गुहार  लगा  दी ....
5 मिनट  भी  नहीं  गुजरे  होंगे  कि  एक  परीचित  का  फ़ोन  आ  गया  और  उन्होने  अपने  एक  कोटा  में  रहने  वाले  मित्र  से परिचय  करा  दिया ...
आनन  फानन  नंबर  , पता  दिया  गया  और  रात और  गहराती  इसके  पहले  ही  बच्चों  के  पास  मदद  पहुचं  गई ....
दिल  गद गद  हो  गया ...
मस्तक  श्रद्धा  से झुक  गया ...
दिल  से ढेरों  दुयायें  निकल  गई ...
मदद  करने  वाले  व्यक्ति  का  नाम  था  
मौलाना नफीस  बेग .....

Wednesday, April 7, 2021

Moradabadi Daal

मुरादाबादी  दाल ,
आजकल  बहुत  प्रसिद्ध  हो रहीं  हैं ,
सुना  हैं  कि  कई  पांच  सितारा  होटेल  के  दामी  menu card में  भी अपना  नाम  दर्ज करा चुकी हैं ,
खैर  मेरी  और  इस  चटपटी  दाल  की दोस्ती  तकरीबां 45 saal पुरानी  तो होगी  ही ....
चूकें  ननिहाल  खास  मुरादाबाद  का  था  तो इसका  स्वाद  तो बचपन  में  ही चखा दिया  गया  था ,
सुबह  सवेरे  नानी  नाना  को झक सफेद  कुरते  पजामे  में  सजा  कर  बांस  की नाव  अकार  टोकरी  थमा  कर भेज देती  हैं  किसी  गली  के  नुक्कड पर , चटपटी  मूंग  की दाल  लाने , पीतल  के  बड़े  बड़े  देगों में  सुलगती  और  धीरे  धीरे  पकती  दाल  अद्भूत  स्वाद  आपकी  जुबां  पर  रचा  बसा  देती  हैं ....
सीधे  साधे  मसालों  में पकी  दाल , हींग  जीरे  से  छुकी  और  नींबू  के  रस  से लगी  लिपटी , अहा , आज  भी जबान  पर  अपना  हक़  ज्यो  का  त्यों जमाये  हुए  हैं ....
लाख  कोशिश  करने पर भी  मुरादाबादी  दाल  का  वोह  स्वाद अवध  में  ज़िन्दा  नहीं  कर पाया शायद  यह  वहां  के पानी का  नमक हैं  जो  अवध  को अपने  नुक्कड   वाली  दाल  का  स्वाद  नहीं दे  पाया ....