Sunday, June 25, 2023

 यूँ तो मेरा जन्मदिन  12 july  को होता हैँ ,

पर  आज  एक  मित्र  के जन्मदिन और  उनकी  post  से कुछ  याद  आ  गया  तो वोह  आप  सब  के संग  साँझा  करता  हूँ ...

बात  करीब  70 के दशक की होगी ,

मेरी अवस्था  6 - 7 साल  की होगी ,

Daddy  ज़िला  फारुख्खाबाद  के चिकित्सा  विभाग के उच्चतम पद  पर थे ,

बड़ा  बंगला ,

सरकारी  गाड़ी ,

नौकर चाकर  से भरा  पूरा  हमारा  घर ....

june  के महीने  से ही 12 july  का इंतेजार  शुरू  हो जाता  था ,

समस्त  सूविधाओं  के होते हुए भी मेहमानों  के खान  पान  की व्यवस्था  स्वयं  Mummy  ही करती  थीं ,

एक  से एक  स्वादिष्ट  व्यंजन , मीठा  और  ना  जाने  क्या  क्या  बनाती  थी ,

थकना  शब्द  तो जैसे  उनके  शब्दकोश  में  था  ही नहीं ,

पर मेरा बालमन इन  सब  से दूर , शाम  को आने वाले  उपहारों  की गिनती और  अनुमानों  में  ही खोया  रहता  था ....

शाम  होते ही हमारा  बड़ा  सा  बगीचा सज जाता  था ,रंग बिरंगी  कागज  की  झांडियो के  साथ ,

अब  इंतेजार  था मेहमानों  का ....

धीरे  धीरे  लोग आना  शुरू हो चुके थे ,

सजे  धजे ,

हंसी और  चहल पहल  का  माहौल  बन चुका था ,

पर  यह क्या  हर  अंकल  आंटी  खाली  हाथ आ  रहे  थे ,

कोई भी कुछ नहीं ला  रहा  था ,

हर  आने  वाले  के  साथ  उम्मीद  जागती  पर  खाली  हाथ देख कर  दिल मायूस  हो जाता ....

इसी  ऊह  पोह  में  शाम  निकल  गई  और  केक  काटने  का  समय  हो  गया ,

अब क्या  केक  काटना  जब  कुछ मिला ही नहीं ,

दिल बेहद उदास  था  बस आसूँ  नहीं आये वोह अलग  बात  हैँ ....

छुरी  उठा  कर केक  काटने  ही वाला था  तभी Daddy  के Junior  शायद  उनका  नाम  Dr . Homdutt  Gupta  था , भारी  भरकम शरीर के  मालिक  आगे  आये और  मेरा  हाथ  पकड़  कर , एक प्यारी  सी हाथ  घड़ी  उस  में  बांध  दी ....

मेरे जीवन की पहली  हाथ  घड़ी ,

सब  Doctors  की  तरफ  से एक प्यारा  सा  उपहार  था ....

बाद  में  पता  चला  कि  उस  वक़्त  उसकी  कीमत  ₹ 200/- के  करीब  थी ...

खैर  उपहार  उपहार  होता हैँ ,

उसकी  कीमत  नहीं  आंकी  जानी  चाहिए ....

बस  उस  दिन से आज  तक  मैनें  घड़ी  की  चाल  से अपनी  चाल  मिला  ली  और  हो गया  मैँ  वक़्त  का  पाबन्द इंसान ....

Thursday, June 22, 2023

 इस  बार  चाह  कर  भी Daddy के  लिए  कुछ  नहीं  लिख  पाया ,

मन  ही नहीं  हुआ ....

विचार  दिमाग  में  ही  कैद  रहें ,

कोई तस्वीर  बाहर  निकल  कर  नहीं  आयी ....

बस  आया  तो उनकी  यादों  का  सैलाब ,

उनके  संग  बिताये  वोह  आखिरी  पल , जब  उनकी  खत्म  होती  हुई  सांसों  को  उनके  सिरहाने  बैठ  कर  गिन  रहा  था ....

एक  एक  छवी  आज  भी दिमाग  में  हैं ...

बस  जुबां  खामोश  हैं ...

खैर , ना  तो कुछ लिखा  ना  बाकी  सब  की  तरह  उनकी  तस्वीर  ही लगाई ...

लगाई  तो पिता  पुत्र  का  एक चित्र  , जो ना  जाने  कितने  साल  पहले  बनाया  था ....

जो पिता  की  कथा  स्वयं  व्यक्त  कर  रहा  हैं ....

पिता  का  साया  हैं  तो हम  कितने  मस्त  हैं ...

पैर  हवा  में  हैं ...

और  हाथ  में  हैं  , जीवन  की  रंग बिरंगी खुशियां ....