बहुत दिनों बाद आज दिल कुछ उदास सा हैं ,
यादें घूमड़ रहीं हैं ,
यूँ ही आज "सूई धागा " हिन्दी चलचित्र देखा ,
एक Scene में बेटा बहुत ज्यादा भावुक हो कर अपने पिता के गले लग जाता हैं ,
बस यहीं मैं भी यादों की हवेली का दरवाजा खोल कर भीतर दाखिल हो गया ....
यूँ तो कभी याद नहीं कि Daddy ने मुझे गले लगाया हो , पर अपने अंतिम दिनों में जब वोह मेरे ज्यादा करीब हो गये थे , तो जब कभी भी मैँ कहीं बाहर जाता तो उनका जर्जर होता ज़िस्म अपनी बांहो में भरता और उनको समझाता कि Daddy मैँ जा रहा हूँ ,
अपना ध्यान रखियेगा और Mummy की सारी बातें मानियेगा ,
किसी अच्छे बच्चें की तरह वोह मेरी बांहो में सिमट जाते और सहमति में सर झुका कर , सर नीचे कर लेते .....
आज बस उस पल का एहसास रह गया हैं I
Daddy जो नहीं रहें....

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