अतीत में जाना कोई मुशकिल काम नहीं हैं ,
बस यादों का दरवाजा खोलिये ,
चरमाराता हुआ दरवाजा , आवाजें निकालता हुआ आपको वहां लें जायेगा जहाँ एक सीले हुए से कमरे में वोह सब यादें और आपके अपने मिल जायेंगे जो वक़्त की धूल में कहीं दब गये हैं...
मैं अगर याद करूँ तो मुझे याद आता हैं मेरी नानी के घर का वोह पुराना काला पड़ चुका लकड़ी का दरवाजा जो काफी जोर लगाने के बाद खुलता था और लोहे की कुंडी , अपना अलग ही सरगम सुनाती थी ....
सीला सा कमरा ,
नानी की खाट ,
नाना का तख्त ,
ढेरों आयुर्वेदिक दवाओं की अजीब सी खुशबू ...
पुराना लटकता हुआ पीला पड़ चुका पंखा ....
कमरा पार कर के आगन में पहुंचते ही नानी की रसोई दिखाई देती थी ,
रसोई में उनका स्टोव और उनके पीले रंग वाला Plastic का मसालदान आज भी याद हैं ....
सब कुछ नाना का होते हुए भी घर नानी का क्यूँ कहाँ जाता था , यह आज तक समझ नहीं आया ....
खैर नानी ने कभी कुछ ऐसा बनाया या खिलाया हो जो याद रह जाये , यह तो याद नहीं , हाँ उनका बनाया हर खाना होता बहुत स्वाद था ....
लाड़ और दुलार का छोंक , देशी के साथ ...
शायद यहीं राज़ था उनकी रसोई का ...
नाना का वोह सुबह सुबह मुरादाबादी दाल , बांस की टोकरी में लाना , गर्म गर्म जलेबी के साथ ....
जो दाल हम बचपन से खाते चले आ रहें हैं आज वोह International Level पर अपनी जगह बना चुकी हैं ,ऐसा होगा यह कभी भी नहीं सोचा था ....
हाँ , बातों बातों में भूल ना जाऊँ , बताता चलूं , नानी की सूती साड़ी में से आने वाली वोह खुशबू आज भी याद हैं .....
हाथ की झूर्रियों को जब मैं समेट कर पूछता कि यह कैसे पड़ गई , तो हसंते हुए बोलती कि अब तो यह चिता में जा कर ही मिटेगी ....
वैसी ही झूरियां अब माँ के हाथ में देखता हूँ पर कुछ कहने या पूछने की हिम्मत नहीं कर पाता .....
धीरे धीरे जिन रिश्तों के साथ हम पैदा हुए थे ,
सब खत्म होते जा रहे हैं ,
नये रिश्तो में अभी वो गर्माहाट नहीं हैं , स्थिती कुछ कुछ त्रिशांकु सी हैं ....
उम्मीद हैं एक दिन नये रिश्ते महकेंगे और हमको यादों की इन विचित्र गलियों से नहीं गुजारना पड़ेगा ....
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