स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर १ विचार मन में आया है..
कितने वर्ष बीत गए स्वाधीन हुए...हम में से कितने होंगे जिनको यह पता भी नहीं होगा की देश को स्वाधीन हुए कितना लम्बा अरसा हो गया..कुछ लोगो के लिए
स्वाधीनता का अर्थ केवल facebook पर तिरंगे की फोटो लगाना..और स्कूल से आये बच्चो द्वारा लाये गए लड्डू का सेवन करना ही है..
बापू ने हम सब को अहिंसा का सन्देश दिया...परन्तु आज हम उसी सन्देश की पूरी तरह से अवहेलना करते नज़र आ रहे है..
आज भी इस देश में फांसी जैसी सजा का प्रावधान है..
क्या यह अपराध नहीं है..अभियुक्त ने अपराध किया..उस ने मासूमो की जान ली..पर हमने और हमारी कानून व्यवस्था ने तो उस से भी जघन्य अपराध कर डाला..उस अभियुक्त को फासी दे कर...
क्या उस अभियुक्त की मानसिकता को बदलने का प्रयास करना १ सुंदर प्रयास नहीं होता इस सुसंसकृत सभ्य समाज का...कहा जाता है की आदमी के पापो से घृणा करो पापी से नहीं...परन्तु यहाँ तो हमने पाप को पापी के संग ही ख़तम कर डाला..
मुझे लगता है की जेल में सजा काट रहे सजायाफ्ता लोगो को योग और अन्य सामाजिक संस्थाओ के माध्यम से सुधरने और १ सभ्य नागरिक बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए..
जब सजायाफ्ता अपराधी सजा काट कर बाहर आये तो अपनी परिवेर्तित मानसिकता से समाज के लिए १ सुंदर उद्धरण प्रस्तुत करे...ऐसा सोचना ही अपने आप में कितना सुखद अनुभव है...

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