एक मित्र द्वारा लिखित 1 लेख पढने का सौभाग्य मिला...
बिलकुल सही लिखा है ...जीवन की आपा धापी मैं हम यह छोटे छोटे सुखों को भूलते जा रहे है...
मुझे आज जीवन के 55 वर्ष पूरे करने के बाद भी वोह सुखद अनुभूती याद है ...जब जिला फरुक्खाबाद मैं मेरे पिता जी 1 सरकारी पद पर आसीन थे ..और हम सब उस छोटे से मगर बेहद खुबसूरत शहर मैं बने हुए 1 फट्टा टाकीज़ में जाया करते थे.....चूकें मेरे पिता जी 1 ऊँचे सरकारी पद पर आसीन थे...अतः हम लोगो को कभी भी धुल के गुबार के बीच टिकेट खरदीने का सौभाग्य नहीं मिला ....यह काम हमेशा हमारे प्रिय काका जिनका नाम शायद इल्याज़ था किया करते थे ...फिर आती थी वोह शाम जिस का हम सब मैं और मेरी बहन व भाई इंतज़ार किया करते थे ...शाम होते होते हमारे सारे मित्रो को पता चल जाता था कि हम सब सलीमा देखने जा रहे है ...बड़ी सी गाड़ी को साफ़ सुथरा कर के निकाला जाता था ...हम सब अपने खुबसूरत लिबासो में ऐसे सज जाते थे जैसे किसी विवाह समारोह में जा रहे हो ...
भीड़ में जा कर गाड़ी का रुकना ...लोगो का कौतुहल पूर्वक हम सब को देखना ...और 1 ख़ास होने का अहसास लिए हुए हम सब का उस फट्टा टाकीज में दाखिल होना ....
फिर शुरू होती थी घिर घिर की आवाज़ के साथ पीले पड़ चुके परदे पर रंग बिरंगी आक्रतियो का रंगा रंग कार्यक्रम ....गर्मी हो तो बहता पसीना...बारिश होती हो..तो टिप टिप करती बूँदे ...और जाड़ा हो तो तेज़ गति से आती सर्द हवाए टाट के उस परदे को बेपर्दा कर के हम सब को सड़क पर होने वाले तमाशो से भी अवगत कराती चलती ....
इसी बीच अगर कोई गाना आ जाये तो पूछिए मत ....इतने स्वर और सीटी baj जाती कि कानो को कई बार बंद करना पड़ जाता था ...
फिर बीच बीच मैं मम्मी के द्वारा बनाये गए आलू के परोठो के संग आम का अचार ...1000रुपया खर्च कर के खरीदे गए pop corns...nacho...etc..मुंह में वोह स्वाद नहीं घोल सकते .
फिर अंत होते होते नींद अपने पूरे जोरो पर आने लगती थी....कई बार तो मम्मी की गोदी ही तकिया बन जाती थी ...और बहन की गोदी पैताना ....
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