आस पास देखता हूँ तो हम सब 50+ की अवस्था वाले एक जैसी ही मानसिक अवस्था में नज़र आते हैं ,
सालों पहले जो तिनका तिनका जोड़ कर एक आशियाना बनाया था आज वोह धीरे धीरे बिखरता नज़र आ रहा हैं , उम्र के साथ स्वास्थ अब कुछ ज्यादा ठीक नहीं रहता , सब कुछ ही digital होता जा रहा हैं , अब बूड़ा तोता कितना राम राम बोलना सिखेगा ,अभी तो बच्चें हैं तो बहुत कुछ काम कर देते हैं , बच्चें अपने पंख पसार रहें हैं , उनकी अपनी नई मांजिले हैं , ऊँची उड़ान हैं ....
पैसों और भविष्य की चकाचौंध हैं ,
लखनऊ उनके सपनों का शहर नहीं हैं ....
और एक हम लोग हैं जो लखनऊ से अपने को अलग देख ही नहीं सकते ,
बच्चों की तरक्की के रास्ते में रोड़ा बनना हमारा निजी स्वार्थ होगा ,
वोह बाहर जायेंगे ही और जाना भी चाहिए ....
फिर क्या किया जायें ,
समाधान सरल हैं ,
अपने अपने घर और दिल के दरवाजे खोलिये , आस पास के लोगों से हाथ नहीं दिल मिलायें ,
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