इस बार चाह कर भी Daddy के लिए कुछ नहीं लिख पाया ,
मन ही नहीं हुआ ....
विचार दिमाग में ही कैद रहें ,
कोई तस्वीर बाहर निकल कर नहीं आयी ....
बस आया तो उनकी यादों का सैलाब ,
उनके संग बिताये वोह आखिरी पल , जब उनकी खत्म होती हुई सांसों को उनके सिरहाने बैठ कर गिन रहा था ....
एक एक छवी आज भी दिमाग में हैं ...
बस जुबां खामोश हैं ...
खैर , ना तो कुछ लिखा ना बाकी सब की तरह उनकी तस्वीर ही लगाई ...
लगाई तो पिता पुत्र का एक चित्र , जो ना जाने कितने साल पहले बनाया था ....
जो पिता की कथा स्वयं व्यक्त कर रहा हैं ....
पिता का साया हैं तो हम कितने मस्त हैं ...
पैर हवा में हैं ...
और हाथ में हैं , जीवन की रंग बिरंगी खुशियां ....
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