नानी का आँचल ,
बिना किसी कस्तुरी के महकता हुआ सा वोह सूती साड़ी का आँचल ,
प्यार , दुलार और माँ के पास होने का एहसास कराता हुआ वोह मेरी नानी का आँचल ,
कितने ही वर्ष बीत गये ,
ना आज नानी हैं ना ही उनका वोह सूती साड़ी वाला , कलफ से अकड़ा हुआ पर हमारे लिए रेशम से भी मुलायाम और महकता आँचल ....
पर उसकी खुशबू आज भी दिल और दिमाग में ज्यों की त्यों हैं ....
उनके आने पर उनसे चिपट कर जो शांति और प्रेम का एहसास होता था वोह आज का दामी meditation या योगा भी नहीं दिला सकता इस बात का पक्का यकीन हैं मुझे .....
खैर जीवन के आखिरी सालों में वोह बेचारी साड़ी तो कभी पहन नहीं पाई और जीवन के आखिरी पल यूँ ही बिस्तर में काट दिये .....
अपनी नाश्वार देह त्यागने के उपरांत एक बार फिर से उनको उनकी प्रिये सूती साड़ी में लपेटा गया ,
माथे पर साजाई गई बड़ी सी लाल बिन्दी , मांग में सिन्दूर भर कर शिंगार पूरा किया गया ,
सर पर कोरे आँचल का पल्ला रखा गया , और नाना को बोला गया कि आखिरी बार देख लो ,
कांपते हाथों से उनका शांत पड़ गया चेहरा हाथों में लिया और रूँधे हुए गले से बस यह बोल पाये,
अच्छा भाई , जा रहीं हो .....
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