Wednesday, March 23, 2022
Holdall
Hold All....
शायद पारम्परिक अन्दाज से समझा जाये तो यहीं अर्थ होगा कि जो सब कुछ अपने में संजो लें य़ा बांध लें ,
इस शब्द और इस कभी भी ना भूलने वाली अद्भूत चीज से मेरा परिचय मेरी नानी ने करवाया था ,
उनके वक़्त तो Holdall भी नहीं होता था वोह एक पुरानी दरी लें कर ,सारा समान उस में ही व्यवस्थित करके 2 मजबूत रस्सियों से ऐसे कस कर बांधती थी कि मजाल हैं कि समान एक इंच भी इधर से उधर हो जाये ,
दर्मियाने कद में कहाँ से वोह पवन सुती शक्ति आ जाती थी , सोचने का विषय हैं ,
नाना शुरु से रहें जोगिया मिजाज , सो उनका इन सब से कुछ लेना देना नहीं था ,
वोह भले और उनकी शिव भक्ती भली ....
नानी ने पूरे परिवार को संभालते हुए घरेलू जुगाड़ वाले बिस्तरबंद के साथ ना जाने कहाँ कहाँ कि य़ात्रा कर डाली ,
वक़्त बिता और फिर यह ज़िम्मेदारी मेरे माता पिता ने संभाली , ट्रैन का सफर और बिस्तरबंद (Holdall) का चोली दामन का साथ ....
हम 7 लोगो का समान , रजाई , ओढ़ने बिछाने के कपड़े , जूते के थेले और भी ना जाने कितने ही इधर उधर के समान उस विशालकाय होलडाल्ल में ऐसे समा ज़ाते थे जैसे ऊंट के मुंह में जीरा ..
फिर Mummy से Green Signal पाते ही Daddy उसको बांधना शुरु करते थे ,
उसकी belts और daddy की मजबूत पकड़ उसको एक खास डमरू का सा रुप दे देती थी ,
ट्रैन के वक़्त पर ना आने पर वहीं हमारी विश्राम स्थली हुआ करती थी और ट्रैन के आ जाने पर हम सबको अपनी अपनी जगह बैठा य़ा लिटा कर कई बार 2 bearth के बीच उसी बिस्तरबंद को Daddy को अपना बिछौना बना कर लेटते हुए देखा हैं .....
खैर अब ना नाना नानी रहें और ना ही Daddy ,
बिस्तरबंद भी ना जाने कौन से अंधेरे कोने में खो गया , भगवान जाने उसका अस्तित्व अब हमारे घर में हैं भी कि नहीं ....
हाँ पर उस में बंधी हमारी यादें आज भी टस्स से मस्स नहीं हुई हैं ,
अभी जीवन यात्रा जो जारी हैं ....❤️❤️
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