अभी किसी मित्र ने यूँ ही एक तस्वीर भेज दी , जहाँ पूरा परिवार एक साथ एक ही पलंग पर बैठा हैं ....
शायद हम वहीं कुछ बनाते हैं जो कुछ हम स्वयं अनुभव करते हैं ,
बरसों पहले हम भाई बहन , माता पिता के साथ यूँ ही एक पलंग पर ना जाने कितने ही किस्से कहानियां बुना करते थे ....
जाड़े की सर्द रातें , सूती छापेदार लिहाफ , हम पांच और मम्मी का जादूई स्टील का डिब्बा , मेवे से भरा हुआ ....
कब खत्म हो जाता था , पता ही नहीं चलता था ,
कभी कभी यूँ ही बिस्तर में घूसे घूसे सो जाता था और मम्मी गर्म गर्म खाना सोते सोते ही खिला देती थी पर सोते सोते भी जीभ पर सारे स्वाद रहते थे कि अगला कौर काहे से खाना हैं ....
Daddy का tour से वापिस आना और य़ात्रा का लेखा जोखा खुलना भी बिस्तर पर ही हुआ करता था ,
खैर किस्से तो बहुत हैं ,
पलंग भी हैं ...
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