सन 1977 में एक छोटे से जनपद मुरादाबाद से इस महानगरी लखनऊ में आना हुआ था ,
9-10 साल की उम्र में यह शहर की चहल पहल मेरे लिए अद्भूत और रोमांचकारी थी ,
माँ का आँचल पकड़े पकड़े अमीनाबाद की सड़को पर चलना और कहीं खो ना जाऊ इस डर से खुद को बचाना अपने आप में एक बड़ा काम हुआ करता था ,
खैर उस वक़्त जो चीज मुझे सब से ज्यादा चौकाती थी वोह थी अमीनाबाद की सड़को पर बिकता हुआ पीने वाला पानी ,
जो शायद तब 5 य़ा 10 पैसे का हुआ करता था ,
साफ सुथरे ठेले , चमचमाते शीशे के ग्लास और उनसे छलकता पानी ,
बार बार सोचने पर भी यह नहीं समझ पाता कि आखिर इस शहर में पानी क्यूँ बिकता हैं ,
बाल मन का कौतुहूल शांत करने के लिए कई बार माँ से आग्रह कर के पानी ख़रीद कर पिया चाहे प्यास थी चाहे नहीं ....
कुछ भी खास नहीं लगा ....
शायद घर का पानी ही ज्यादा मीठा होता हैं , ऐसा कुछ दिल और दिमाग दोनों बोल पड़े ....
खैर धीरे धीरे इस शहर ने मुझे और मैनें इस शहर को अपना लिया ....
लखनऊ ने मुझे बहुत कुछ दिया ,
नाम , पहचान , इज्ज़त , दोस्त और भी ना जाने क्या क्या ....
परंतु जो कभी जीवन में नहीं सोचा था आज वोह स्वयं आँखो के आगे होता देख लिया ....
लखनऊ में आज पानी के साथ ही साथ साँसे भी कालाबजारी के साथ बाजार का एक हिस्सा बन गई ....
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