Sunday, July 26, 2020

बात है तकरीबन 8 से 10 साल पुरानी....
नया नया इंटरनेट के माध्यम से सोशल साइट्स पर जा कर अनजान पर एक जैसी सोच रखने वाले व्यक्तियों से दोस्ती करने का रुझान विकसित हो रहा था। 
इसी दौरान एक सुदूर प्रान्त पश्चिमी बंगाल के एक अनजान व्यक्ति से मित्रता हुई ......
मित्रता समय के संग सोशल  साइट्स से बढ़ कर फ़ोन तक पहुची पर उसके चेहरे से मैं अभी भी अनजान था ...
घंटो विचारो का आदान प्रदान होता ....समस्याए ,खुशिया जीत और हार सब साझा की जाती पर  दिखने मैं वोह कैसा है यह अभी भी केवल कल्पित ही था .....
फिर एक समय ऐसा भी आया की वोह मेरा सब से अच्छा  दोस्त बन गया .....पर मैं चाह कर  भी उस को भीड़ मैं नहीं ढूंढ सकता था क्यूंकि मैं तो केवल उसकी आवाज़ से परिचित था ....उस के चेहरे से नहीं ....फिर एक दिन मैंने अपनी रूचि के अनुसार उस आवाज़ को एक चेहरा देकर उस शख्सियत को मुक्कमल कर दिया .....
कई माह ऐसे ही चला ...
फिर मेरी चित्र प्रदर्शनियों के दौरान मुझे उसके शहर जाने का मौका मिला और हम पहली बार एक दुसरे के रूबरू हुए ....
और शायद हम दोनों ने आवाजों के लिहाज़ से एक दुसरे को कुछ ज्यादा ही गलत चेहरे दे दिए थे....
फिर यही 
 सोचते रहे की अगर हमारी मुलाकात केवल टेलीफोन तक ही सिमटी रहती तो शायद ज्यादा अच्छा होता..
यह किस्सा साझा इस लिए किया क्यूँ की 
लखनऊ बुक क्लब की मासिक गोष्टी में इसी से मिलती जुलती Annie Zaidi. की एक कहानी चर्चा का विषय बनी थी ......

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