Sunday, July 26, 2020

यादें ,
भूल  जाती  हैँ ...
यादें  ही बहुत याद  आती  हैँ ....
आज  भी जब याद  करता  हूँ  24th September 2002 का  वोह दिन  तो जैसे किसी फिल्म  की  रील  सी घूम  जाती  हैँ  आँखो  के सामने ,
नानी  अपनी  बूढ़ी  ज़र्जर काया  को लेकर  सरकारी  Ambulance  मे  मुरादाबाद  से लखनऊ तक  का सफर  16 घंटे  मे  तय  कर  के  आयी ,
घड़ी  आखिरी  हैँ  यह शायद  वोह समझ  गई  थी ,
फिर भी आंखे  बंद  होने से पहले  एक बार  एकलौती  संतान  को देखने  का मोह  उनको  यहाँ  तक ले  आया  था ....
घर  की दहलीज पार  कर  के जैसे ही उन्होने  माँ  को देखा और  बस  हमेशा  के लिए  आंखे  मूंद  ली ...और निकल ली अजर अमर य़ात्रा पर ....
उसके  बाद  सारे  रीती  रिवाज  शुरू  हुए ,
नाना  की कमर जैसे  कुछ  ही समय  मैं और  भी झूक  गई  थी ....
शमशान  मे  चिता  के ऊपर  लेटी  नानी , सूती  साड़ी  में  बेहद शांत  और  गारिमामई लग  रही  थी ....
पंडित  ने सारे  विधी  विधान  किये  और  मुखागिनी  देने  से पहले  पंडित जी नाना  से बोले  बाबू  जी देख  लिजिये  माता  जी को  आखिरी  बार ....
नाना  बेचारे  जैसे  तैसे  कर  के  नानी  तक  आये और  गोरे  पर  बर्फ से  भी ज्यादा  ठंडे  पड़ गये  चेहरे  को  झूरियों  वाले  हाथों  मे  भर  कर  बड़े  प्यार  से  सहलाते  हुए  बोले ....
अच्छा  भाई ,
जा  रही  हो तुम .....
इतने  साल  बीत  गये  पर  यह वाक्य  आज  भी बोलते  हुए  मेरी  आँखे  नम  और  आवाज  भर्रा  जाती  हैँ ...
और  नानी  की वोह चिरपरिचित  आवाज  कानों  में  गूजनें  लगती हैँ ...
पंकज  
अरे  ओ  पंकज .....

No comments:

Post a Comment