Sunday, July 26, 2020

बरसो पहले कभी पढ़ी हुई हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका गौरा  पन्त शिवानी की लिखी हुई कथा साध्वी यूँ आँखों के आगे जिवंत हो जाएगी सोचा न था.… 
वही जंगल का बीहड़ …
दुर्गम राहे ....
जीवन का एकाकीपन...
और उस पर अपने अस्तित्व को और भी रहस्मयी बनती हुई वोह साध्वी…. 
उसका वोह मरदाना सा अस्तित्व…जोगिया वस्त्रो में और भी रहस्मई लग रहा था…. 
सही कहू  तो मैं आँख भर कर  उनको देखने का साहस  भी नहीं कर पाया…. 
कि कही उन लाल आँखों में  जिनमें उनके तप  की आग थी या किसी गांजे का धुआ…. की अग्नि मुझे भस्म न कर दे ….बस इसी  सोच और भय के संग मन के अंदर सवालो की पोटली को यूँ ही बांधे हुए मैं वापिस चला आया… 
पर  यह समझ गया की उपन्यासों के चरित्र हमारे रोजमर्रा के जीवन के इर्द गिर्द से ही लिए जाते और जीवित किये जाते है ….

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