Sunday, July 26, 2020

ह्रदय  अघात  के उपरांत  बिस्तर  प़र  लेटे  लेटे  जब  बोर  होने लगा  तो एक प्रिये  मित्र  द्वारा  दी  गई  कुछ  पुस्तकों  की  ओर  मुख  घुमाया  तो खुशवांत सिंह  की " औरतें " एक दिलचास्प option  लगा ,
255 पृष्टों  की मोटी  ज़िल्द  चड़ी किताब  को जब  हाथ में  लिया और  पढ़ना  शुरू  किया  तो समझ  आ  गया  कि  यह एक  सही  चुनाव  साबित  होगा , खराब  वक़्त  को काटने  में....
धीरे  धीरे खुशवांत  सिंह  की चिरपरीचित  लेखन  कला  जो कि  कभी  कभी मस्त राम  की  लेखनी  को भी पीछे  छोड़  देती  हैं  ने अपना  प्रभाव  छोड़ना  शुरू  किया  और  मुझे पुस्तक  के आखिरी  प्रष्ठ  प़र  मेरी उम्मीद  के विपरीत  जल्दी  ही पहुचां दिया ....
खैर  कथा  वस्तु  क्या  थी  क्या  नहीं  यह  तो जाने  दिजिये  परंतु  मैं  यह  जरूर  जानना चाहूँगा  कि  कथा  का  नायक  एक उच्च  वर्गिये करीब  40 वर्ष  का युवक  हैं ...
पढ़ा लिखा ,सुसंसकृत और सभ्य ....
प़र  जिस  तरह  से उसको  गढ़ा गया  हैं  वहां  वोह बेहद लम्पट ,कामपिपासु  और  व्याभिचारी  लगता  हैं ....
क्या  हर  भारतीय  पुरूष  इतना  ही  कामातुर  होता हैं  य़ा  खुशवांत  सिंघ ने अपनी  83 साल  की अवस्था में  बहुत कुछ चाह  कर  भी ना  कर  पाने  का  विशाद  इस  मोहन  कुमार  नामक  युवक  के  सर  मड़ कर  अपने  आप  को  संतुष्ट  किया  हैं .....

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