ह्रदय अघात के उपरांत बिस्तर प़र लेटे लेटे जब बोर होने लगा तो एक प्रिये मित्र द्वारा दी गई कुछ पुस्तकों की ओर मुख घुमाया तो खुशवांत सिंह की " औरतें " एक दिलचास्प option लगा ,
255 पृष्टों की मोटी ज़िल्द चड़ी किताब को जब हाथ में लिया और पढ़ना शुरू किया तो समझ आ गया कि यह एक सही चुनाव साबित होगा , खराब वक़्त को काटने में....
धीरे धीरे खुशवांत सिंह की चिरपरीचित लेखन कला जो कि कभी कभी मस्त राम की लेखनी को भी पीछे छोड़ देती हैं ने अपना प्रभाव छोड़ना शुरू किया और मुझे पुस्तक के आखिरी प्रष्ठ प़र मेरी उम्मीद के विपरीत जल्दी ही पहुचां दिया ....
खैर कथा वस्तु क्या थी क्या नहीं यह तो जाने दिजिये परंतु मैं यह जरूर जानना चाहूँगा कि कथा का नायक एक उच्च वर्गिये करीब 40 वर्ष का युवक हैं ...
पढ़ा लिखा ,सुसंसकृत और सभ्य ....
प़र जिस तरह से उसको गढ़ा गया हैं वहां वोह बेहद लम्पट ,कामपिपासु और व्याभिचारी लगता हैं ....
क्या हर भारतीय पुरूष इतना ही कामातुर होता हैं य़ा खुशवांत सिंघ ने अपनी 83 साल की अवस्था में बहुत कुछ चाह कर भी ना कर पाने का विशाद इस मोहन कुमार नामक युवक के सर मड़ कर अपने आप को संतुष्ट किया हैं .....
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