अवध -
कला एवं संस्कृती का केन्द्र बिन्दु रहा परंतु आश्चर्या का विषय हैं कि इस में कही भी चित्रकारी के सम्बंध में ना के बराबर कुछ लिखा य़ा कहा गया हैं ....
अवध में प्रारम्भीक चित्र शेली में योगदान रहा कुछ दिल्ली सलतनत के मुग़ल कालिन चित्रकारों का ,
ज़िन्होने लखनऊ आकर स्थानीये कलाकारों के सहयोग से कुछ चित्र अंकित किये , कभी कभी दोनों चित्रकारों ने मिल कर एक ही चित्र पर कार्य किया जोकि एक दुष्कर कार्य हैं किसी भी कलाकार के लिए क्यूंकी हर चित्रकार य़ा कलाकार अपनी व्यकिगत सोच के अधार पर किसी कला की सरचना करता हैं ....
तत कालीन चित्रों में मुगल कालीन चित्र शेली का प्रभाव स्पष्ट रुप से देखा जा सकता हैं ,
तदूपरांत भारत वर्ष कम्पनी राज्य अपनी जडे ज़मा रहा था और समान्य जन जीवन , संस्कृती में एक बदलाव दिखाई देने लगा था , यहीं वोह समय था जब बादशाह नसीरुद्धिन हैदर जोकि बादशाह गाजिउद्धिन हैदर के बेटे थे, के शासन काल में अवध में होने वाली चित्रकला में कुछ यूरोपियन कलाकारों ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई और स्थानिये कलाकारों के सहयोग से एक नई शेली का जन्म हुआ ज़िसे "कंपनी स्कूल ऑफ आर्ट " के नाम से जाना गया ,
इस शेली में राजपूत ,मुगल और यूरोपियन कला सब कलाओं का संगम स्पष्ट रुप से देखा जा सकता हैं ,
यह चित्रकला मुख्यता कागज पर ही ऊकेरी गई जबकि कुछ चित्रों में हाथी दांत का भी उपयोग हुआ हैं .
उपरोक्त चित्रकला 18वी एवं 19वी सदी में एक प्रचिलित चित्रकला रही और नवाब वाजीद अली शाह के शासान काल में अपने उच्चतम मुकाम तक पहुची .
इसके पश्चआत लखनऊ , लखनऊ के नवाब , बेगम ,आलिशान ईमारतों , हवेलियों , समान्य जन जीवन को देश भर के चित्रकारों ने अपनी अपनी कल्पना की उडान और रंग दिये ...
कुछ नए और खूबसुरत प्रयोग भी किये जो कि Mixed Media के नाम से जाने गए ,
परंतु इतना सब कुछ होने के बाद भी , आज भी यूँ लगता हैं कि इस खूबसुरत शहर को हमनें चाहे ज़ितना भी अपने कला के दायेरे में समेटा हो , कहीं कुछ छूट सा गया हैं , मानो कहीं कोई उदास और बेकरार बैठा हुआ हैं किसी कलाकार की तलाश में कि कभी तो कोई आयेगा और समय की धूल को हटा कर , फीके पड़ गए रंगो में जीवन के नए और चटक रंग भर देगा ....
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