Sunday, July 26, 2020

"आम " आम  ही रहा , बिचारा  खास  ना  हो पाया ....
गर्मी  के  मौसम  में  और  कुछ  हो चाहे  ना  हो आम  का होना  तो लाजिमी  हैँ ,
हर  वर्ग  का  व्यक्ति  इस  से अछूता  नहीं  रह  पाता ,
ठेले  और  मंडियो  में  सजे  तरह  तरह  के आम  अपनी  ओर  खीच  ही लेते हैँ ....
खास  बात  हैँ कि  यह हर  वर्ग  की पसंद  हैँ ,गरीब  से  लेकर  अमीर  तक  इसके  रस  और  गूदे  के  दीवाने  रहते  हैँ ,
भारत  वर्ष  में  तो यह  सामूहिक  खान  पान  का भी एक अभिन्न  अंग  हैँ ....
Summer Holidays आते  ही बच्चें  नानिहाल  पहुचं  जाते  हैँ  और  लग  जाती  हैँ duty नाना  य़ा  मामा  की , बाजार  से चुन चुन कर आम  लाने  की ,
फिर एक बड़ी  बाल्टी  में  पानी  भर  कर  उस  में  आम  ठंडे  किये  जाते  और  चारो  ओर  से घेरे  हुए  चढढी  बानियान  में  सजे  बच्चों  की  फौज  में  बांट  दिये  जाते ,
चुसते ,चाटते य़ा  फिर काट  काट  कर  खाते  कब  आम  खत्म  हो जाते  पता  ही नहीं चलता  था ,
इसी  के साथ  साथ नानी  की कहानियों का  दौर  भी बादस्तुर चलता  ही रहता  था ....
पहली  बार कपड़ो के  दाग  माँ  को भी परेशान  नहीं करते थे ,
आम  का  आचार और  पूरी  य़ा  पराठा  आज  भी भारतीय  रेल  में  खाया  जाने  वाला  प्राचींतम भारतीय  भोजन  होगा ऐसा मेरा दावा  हैँ ....
बस  इसी  लिए  यह फलों  का  राजा  बस " आम " ही  रहा  कभी  खास  नहीं  हो पाया ....

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