Sunday, July 26, 2020

गुरु रविंद्रनाथ टैगोर की लघु कथा "काबुलीवाला " का एक अंश .......
"उसने अपने कुरते की जेब में हाथ डालकर एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकाला औऱ बड़े जतन से उसकी चारों तह खोलकर दोनो हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया। देखा कि कागज के उस टुकड़े पर एक नन्हें से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप हैं। हाथ में थोड़ी-सी कालिख लगाकर, कागज़ पर उसी की छाप ले  ली गई थी। अपनी बेटी इस याद को छाती से लगाकर, रहमत हर साल कलकत्ते के गली-कूचों में सौदा बेचने के लिए आता है...."
मुझे याद दिला  गया एक छोटा सा पर  बेहद खूबसूरत वाक्या  मेरे और मेरी बेटी के जीवन का ....
तब मेरी बेटी कोई 4-5 बरस की होगी....
उस के स्कूल में भी उसके नन्हे नन्हे हाथो की छाप ली गई थी ...
1 सादे से कागज़ के पुर्जे पर .....
कुछ बहुत ही खुबसूरत सी पंक्तिया लिखी थी .....
जिनका अर्थ था की पापा जब मैं बड़ी हो जाउंगी और आप से दूर हो जाउंगी तब  मेरे हाथो की यह छाप आप को ये ही याद दिलाएगी की मै आज भी आप की वही छोटी सी बिटिया हूँ  जो आप ही के आंगन में  खेली और एक चिड़िया की तरह चहकी है .....
बदकिस्मती से मैंने वोह कागज़ का पुर्जा कही खो दिया....
पर   उसकी याद दिल में संजो ली....

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