Sunday, July 26, 2020

आज सुबह  से  एक  बेहद  मजाकिया ख्याल  दिमाग  में  हैं ...
देखता  हूँ  ख्याल  को  कहाँ  तक  शब्दों  का  ज़ामा  पहना  पाता  हूँ ....
डाक विभाग से  एक  post  card  मिला  करता  था ...
पिला सा ,मटमैला सा और  आयाताकार आकार का ....
आज  कल  के  बच्चों  ने  शायद  देखा  भी  नहीं  होगा ...यह  पढ़ने  के  बाद  शायद  कुछ  लोग  google  में  खोजे ...
संदेश  पहुचाने  का  सब  से  सुन्दर  सस्ता  और  टिकाऊ  तारिका  हुआ  करता  था ...
पर  मजाक  कि  बात  यह  थी  कि  जो  बाते  हम सब  से  छुपाते  हैं  वही घर  भर  की  पुराण  हम  बड़े  शान  से  इस  कागज  के  पुरचे  पर  लिख  कर  भेज  देते  थे ....
ना  किसी के  पढ़ने  का  डर ना  ही  कोई  शर्म ...
चाहे  साजन  सजनी का  प्यार  हो ...
चाहे  सासुराल  में  पड़ी  सास  नन्द की  फटकार ...
फिर  चाहे  बाबुल  का  प्यार  हो ...
य़ा  सावन  पर  घर  आने  की  माँ  की  मनुहार ....
सब  कुछ  साफ  और  खुला  खुला ....
उन  खतों  में  वास्तव में  रिश्तो की  खुशबू  हुआ  करती  थी ....
अपनो  का  स्पर्श  का  एहसास  हुआ  करता  था ....
हो  सकता  हैं  कि  कई  मित्रों  के पास  आज  भी  कुछ  यादें  किसी  पोटली  में  समय  के  साथ  पीले   पड़  गये  कपड़े के  साथ  बंधी  रखी  हो ....
अगर  हो  तो खोल  कर  देखियेगा ....
यादों  से  आप  और  आप  का  मन  महक उठेगा ....
चिठ्ठी  आयी  हैं ,
आयी  हैं  चिठ्ठी  आयी  हैं .....

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