Sunday, July 26, 2020

काशी.....
जब कुछ लिखने बैठा था तब सोचा था की चंद यादे ही तो शब्दों  के माध्यम से पिरोनी है ,पिरो लूँगा....
पर  यह कार्य इतना दुष्कर और जटिल हो जायेगा इसका मुझे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं था। 
काशी ....शिव की नगरी ,जो अब श्री नरेंद्र मोदी की नगरी हो गई है ,बदली हुई राजनैतिक परिस्थितयों में ,यहाँ के लोगो को शायद शिव से इतनी उम्मीदे नहीं होंगी जितनी  अब श्री मोदी से है ,खैर विषय को राजनैतिक न बनाते हुए फेसबुकिया ही रखते हैं ,हल्का फुल्का ,बनारसी चुहलबाजी से भरपूर। 
फरवरी 2007 मैं मैंने पहली बार इस 3000 वर्ष से भी प्राचीन नगरी मैं अपने चित्रो की प्रदर्शनी करने का सौभाग्य पाया था ,यात्रा और अनुभव अच्छा रहा था पर मन मैं एक कसक रह गई थी की गंगा आरती नहीं देख पाया , सो इस बार ठान कर  निकला था की चाहे कुछ भी हो जाये गंगा आरती का तो सुख ले कर  ही रहूँगा...
आभारी हूँ वह के मेरे मित्रो का जिन्होंने इस अद्भुत दृश्य और अनुभूति से मेरा परिचय कराया ,हज़ारों की भीड़ पर  जर्रा भर भी कलरव नहीं .....
वातावरण मैं था तो बस मंत्रो की गूँज और लोबान का महकता हुआ धुआँ .....
जो हम सब को एक ओंकार से जोड़ रहा था … 
कुछ अनुभूतियाँ शब्दों मैं व्यक्त नहीं की जा सकती ,उस के लिए आप को एक बार बनारस के उन घाटो पर जाना ही पड़ेगा ,और यकीन मानिए सौदा घाटे  का नहीं रहेगा। 
यूँ तो इतनी यादे ले कर लौटा हूँ  की बनारस के १०० घाटो से भी ज्यादा पन्नें भर सकता हूँ ,पर  कुछ चुटीले और कुछ दार्शनिक अनुभव ही साँझा करूँगा , घाट किनारे जब माथा भर भर के तिलक लगाते  पंडितो को देख कर  मैं अपने दिल को नहीं रोक   पाया तो मैं भी एक बनारसी गोल छतरी के नीचे बैठे पंडित के पास बैठ गया और आग्रह किया की माथा भर कर सुन्दर सा तिलक सजा दे ,एक  मित्र के टिप्पडी करने पर  की  ऐसा टिका लगाना पंडित जी की इस के पाप धूल जाये ,ख़ास बनारसी अंदाज़ में  चुहलबाज़ी करते हुए पंडित जी अत्यंत कुटिलता से बोले की ..... अरे बबुआ पाप न करीं तो बाप कइसन बनी। 
कहना व्यर्थ होगा की वह एक जोर का ठाहका गूँज उठा ....
इसी प्रकार मेरे एक मित्र के आग्रह पर  जब हम सब उत्तपम खाने एक बेहद सरल से दिखने वाले व्यक्ति के पास गए जिस के हाथो मैं स्वयं माँ अन्नपूर्णा का वास था ,इतना स्वादिष्ट उत्त्पम् आप किसी महंगे से महंगे दामी भोजनालय मैं भी नहीं पाएंगे ऐसी मेरी गारंटी हैं ,खैर उत्तपम पर्व खत्म हुआ, चलते चलते सोचा की तारीफ कर दे और धन्यवाद दे दे , इस पर उस सज्जन व्यक्ति ने इतनी दार्शनिक बात कह डाली की सुन कर  उस के आत्मिक ज्ञान  एहसास हो गया
 ... 
बाबू जी यह मेरे लिए उत्तपम नहीं है ,यह मेरे लिए मेरे परिवार का भविष्य है और मैं अपने परिवार के भविष्य के संग खिलवाड़ और बेईमानी कैसे करुँ , पूरी ईमानदारी से काम करता हूँ बाकि भगवान् की मर्ज़ी
 .... 
अंत करना चाहूंगा इस यात्रा का पर संभव नहीं हो पायेगा क्यूंकी मेरे  कलाकार अस्तित्व का एक भाग अभी भी गंगा मैया के पावन जल में डुबकी लगा लगा कर वही किसी घाट के कोने में शिव की भांग में  मद मस्त हो कर  झूम रहा है.....

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