Sunday, July 26, 2020

बात  उन  दिनों  की  हैं  जब  लोगों  के  मिजाज़  और मौसम  के तेवर इतने  गर्म  नहीं  हुआ  करते  थे ,
स्कूल  बंद  होते  ही , नानी  के घर  जाना  अनिवार्य  हुआ  करता  था  और  शायद  यहीं  एक  काम  ऐसा  होता  था  ज़िसका  थोपा  जाना  हमको  बुरा  नहीं  लगता  था ,
ट्रैन  का  वोह  धूल  भरा  सफर ,
अजनबी पसीने  की  गंध ,
मिट्टी  की  सुराही  का  शीतल  जल  और  पूरी  आलू  की  सुगंध , वहीं  हमारा  पूरा  संसार  हुआ  करती  थीं ,
अरे  हाँ ,
Station पहुचं  कर  वोह  वजन लेने  वाली  machine  पर  ठीठकना और  Mummy  की  तरफ  देख  कर  वोह  10 पैसे  के  सिक्के  के  लिए  अर्जी  लगाना  आज  भी  याद  हैं ,
रास्ते  में  पढ़ने  के लिए  चन्दामामा  से ले  कर  चाचा  चौधरी  तक  ना  जाने  कितनी  ही  किताबें  ले  लेना ,
बहन  भाई  से लड़  कर  खिडकी  के पास  वाली  Seat  लेना , और  द्रूत  गती  से भागते  हुए  पेडों  को  देखना , अपना ही  एक  अलग  आनन्द  हुआ  करता  था ....
Train  के  plateform  पर  पहूचने  पर  नाना  को  कभी  खोजना  नहीं  पड़ा , सफेद  चिट्टे  कुरते  पजामे  में  वोह  हमेशा  इंतेजार  करते  हुए  मिला  करते  थे ,
Station  से नानी  के घर  तक  का  सफर  रिक्शे  में  नाना  के  संग  बात  करते कैसे  कट  जाता  था , कभी  पता  ही नहीं  चला .....
घर  नाना  का  होते  हुए भी हमेशा  नानी  का  घर  कैसे  कहलाया जाता  हैं यह  समझ  नहीं  आया ....
फिर शुरू  होता  था  नानी  का  लाड़  प्यार ....
ज़िसकी  कोई  सीमा  नहीं  होती  थी ,
माँ  भी  वहां  जाकर  एकदम  शांत  हो  जाती  थी ,
देशी  घी  में  ना  जाने  नानी  कौन  से प्यार  का  मसाला  डाल  कर  छोंक  लगाती  थी  कि  कब  खाना  खत्म  हुआ , पता  ही  नहीं  चलता  था ....
रात  होते  ही  घर  की  छत पर  बान से बुनी  हुई  चारपाई डाली  जाती  थीं  और उन  पर  बिछती  थी  सूती  सफेद  च्ददर ,
रात  होते  होते  चाँद  की  रोशनी  उन  चादारों  को भी  एकदम  शीतल  और  आरामदेह  कर  देती थी ,
फिर  लेट  कर  तारों  को  गिनने  का  सिलसिला  शुरू  होता  था  जो  सुबह  होने  तक  चलता  था ....
बस  इनही  खेलों  में  15-20 दिन  कैसे  निकल  जाते  थे  पता  ही नहीं  चलता  था ,
कठिन  होता  था , नानी  को  रोता  हुआ  छोड़  कर  आना , वोह उनकी  ठोडी  पर  रोते  समय  10 पैसे  का  सिक्का  सा  छप जाना और  उनकी  भरी  हुई  आँखो  को  देखना , उफ़  नहीं  याद  करना  चाहता  मैँ ....
उनके  आँचल  की  बिना  किसी  इत्र  से महकती हुई  खुशबू आज  भी  याद  हैं ....
आज  53 साल  की  अवस्था  में  ना  नाना  रहें  ना  नानी ,
नानिहाल  भी  खण्डार  हो  चला  एक  पुराना  मकान हो गया  हैं  ज़िसका  अस्तित्व भी  बस  अब कुछ  दिन  का  ही शेष  हैं ....
पर  आज  भी  याद हैं  नानिहाल  में  गुजरे  हुए  वोह  दिन ......

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