Sunday, July 26, 2020

52 वर्ष  की अवस्था ,
और  स्मरतियों  का भंडार ....
परंतु  शायद  हमारी  पीढी उन  भाग्यवान  पीढी में  से हैं  ज़िनके  पास  कुछ  यादें  तो हैं ....
आजकल  के बच्चों  के जैसे रीते  हाथ  तो नहीं हैं ....
पिता जी एक चिकित्सक  हैं , सरकारी  नौकरी  थी , महीने  की  बंधी  बंधाई  रकम  ही घर में  आती थी , और  माँ  उस में  से ही विधिवत  पूरे  घर  का संचालन करती  थी ....
पिताजी  हमेशा  से बहुत ही Easygoing रहें , कभी भी आतिरिक्त  रकम  के लिए उसके  पीछे नहीं भागे ,
जो मिल गया ,
बहुत मिल गया ....
आज भी याद हैं  जब सार्दियों  के आते  ही हम तीनों  भाई बहन सूती छापेदार  रजाई में  माँ और  पिता  जी के साथ बैठ  जाते थे और  कपोल  कल्पित  किस्सों  के साथ माँ  एक स्टील  का डब्बा  जोकि  मेवा  से भरा  होता  था  हम  सब के बीच में  रख  कर  खोल  देती  थी ...
सीमित  आय  में  भी यह  Luxury  वोह  किस  प्रकार  हमको  देती थी  यह वही  जानती  होगी ....
किस्से  कहानियों  के  बीच कब मुट्ठी  भर भर कर हम सब  वोह डिब्बा  खाली  कर  देते  थे  , पता  ही नहीं चलता  था ....
वोह रजाई  की गर्मी  और  माता  पिता का प्रेम हमारे  जीवन  की सारी  रिक्ताओं  को  दूर करके  हमें  हमारें  भविष्य  के  लिए आशवस्त  कर देता था ....
अब आज  कल की दुनिया  में  यह सब कहाँ  मिलता  हैं ...
मेवों  से ज्यादा  महंगे  हो गये  हैं  आजकल  के  रिश्ते .....

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